दिल्ली दिनांक 21-22 मार्च 2026 को दिल्ली में मूलनिवासी बहुजन संगठनों ने निर्णय लिया है कि अब हमारी नीति ‘‘ मैं नहीं ––हम रहेगी।’’ सफलता और असफलता का श्रेय केवल एक व्यक्ति को नहीं दिया जाएगा, बल्कि सभी को श्रेय दिया जाएगा।
मूलनिवासी बहुजन संगठनों की राष्ट्रीय समन्वय सहयोग समिति की राष्ट्रीय बैठक 21–22 मार्च 2026 को गढ़वाल भवन दिल्ली में आयोजित की गई । बैठक में फुले अम्बेडकरी आंदोलन और विचारधारा से जुड़े 42 संगठनों के 70 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया ।
बैठक की शुरुआत में एनसीसीएमबीओ के राष्ट्रीय समन्वयक सुरेश द्रविड़ ने सभी संगठनों के साथियों का आभार प्रकट किया । उन्होंने एकीकृत विचार और सांझा कार्यक्रम पर बल दिया, उन्होंने चिंतन के बिंदु सदन के सम्मुख रखते हुए कहा कि क्या हमें सदैव अलग ही रहना है ? आखिर अलग–अलग कार्यक्रम लगाकर हम क्या हासिल करना चाहते हैं ? जब हम सबका एक ही उद्देश्य और लक्ष्य है तो फिर हम अलग–अलग क्यों है ? क्या हम मिलकर कार्य नहीं कर सकते ? हम सभी अलग-अलग संगठन अपने संगठनों का अस्तित्व बरकरार रखते हुए कामन मिनिमम प्रोग्राम बनाए। हमारी जिन बिंदुओं पर सहमति बनती है उन बिंदुओं पर हम मिलकर सांझा कार्यक्रम चला सकते हैं ।
बहुत पहले या बीते समय में किसी का किसी के साथ मनमुटाव हुआ भी होगा तो क्या वह हमें अपने मरते दम तक रखना चाहिए ? क्या यह न्यायसंगत है ? बामसेफ के गठन की शुरुआत से लेकर बहुत से उतार चढ़ाव आए, बहुत से मौकों पर वाद विवाद भी हुआ होगा, यह स्वाभाविक है, घर परिवार में भी बहुत से मुद्दों पर मतभिन्नता रहती है लेकिन फिर भी हम अपना घर परिवार नहीं छोड़ते हैं, हमने संगठन बनाया, संगठन में उतार चढ़ाव आते ही है,इसका अनुभव हमारे पास नहीं था, प्रशिक्षण और अनुसंधान के अभाव में सोचने में आई मतभिन्नता के कारण हम कई मौकों पर अलग हो गए, लेकिन सोचने वाली बात यह है कि अलग-अलग रहकर हमने क्या हासिल किया ? क्या आगे भी हमने अलग-अलग रहकर ही कार्य करना है ? हमारे अधिकार धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं,इस पर हमें जरूर सोचना चाहिए।संविधान पर अमल और इसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है । मूलनिवासी बहुजन हमारी राष्ट्रीय पहचान है, सांगठनिक कार्यप्रणाली में लोकतांत्रिक चरित्र विकसित करना हमारा सार्वजनिक और सांगठनिक दायित्व है । वैज्ञानिक दृष्टिकोण की धरोहर ही हमारी ज्ञान प्रणाली है, इसे हम फुले– अम्बेडकरी वैचारिकी भी कहते हैं । सामाजिक एकता प्रस्थापित करने के लिए व्यक्तिवाद, सुप्रीमोंवाद, वर्चस्ववाद का त्याग करना हमारा सामुदायिक, सांगठनिक और सामूहिक संकल्प है ।
इसके पश्चात विभिन्न स्तरों पर आधारित विषयों पर चर्चा आयोजित की गई, इस संबंध में संचालन प्रकिया और प्रणाली की जानकारी दी गई । यह बैठक गोलमेज स्वरूप के आधार पर आयोजित की गई । सहभागी संगठनों का परिचय पर सभी संगठनों के साथियों ने अपने–अपने संगठन की गतिविधियों को सदन के सम्मुख रखा और अपना अपना परिचय भी दिया ।
इस पर अध्यक्षीय टिप्पणी करते हुए बामसेफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष मू० एस आर मौर्या ने कहा कि ‘‘बड़ा दिल और बड़ी सोच से ही संगठन बनेगा ।’’ छल–कपट, चोरी–बेईमानी, ईर्ष्या और द्वेष से संगठन कभी भी नहीं बढ़ेगा । हमारा संगठन स्वैच्छिक है, इसके लिए हम किसी को भी बाध्य नहीं कर सकते । दोस्ती–यारी से ही हमारे संगठनों का विस्तार होगा, विश्वास जल्दी नहीं बनता है, अच्छा व्यवहार करेंगे तो निश्चित तौर पर हम इकट्ठा होंगे, इसलिए अच्छा व्यवहार पैदा करो, नैतिकता पर और अधिक बल दो, हम जब मकान बनाते हैं तो उसकी बुनियाद को मजबूत करते हैं । इसलिए सभी संगठनों को बुनियादी ढांचे को मजबूत करना चाहिए । हम तानाशाही से सबको कन्ट्रोल कमांड नहीं कर सकते । हमें कथनी करनी में फर्क नहीं रखना चाहिए और चाल चरित्र चेहरे में चाल का अर्थ कार्यशैली, चरित्र का अर्थ वैचारिक ईमानदारी और चेहरा का अर्थ ईमानदार, निडर और निष्पक्ष नेतृत्व से है ।
दूसरे सत्र में मू– डॉ वेदप्रकाश, मू– श्याम मेघवाल, मू– गुरदयाल चंद सलहन, मू– जी के शर्मा, मू– सुधीर राज सिंह समण, मू– डॉ देशराज, मू– रघबीर सिंह रंगा, मू– महाबीर सिंह सिंघल, मू– रणबीर सिंह रंगा, मू– सुरजपाल सिंह, मू– परमानन्द, बहुजन संघर्ष के पूर्व सम्पादक मू– जितेन्द्र कुमार, मू– एडवोकेट संदीप टांक, मू– महादेव कांबले, मू– एच एन रेकवाल, मू– प्रदीप चैहान, मू– गणेश शर्मा आदि ने चर्चा में भाग लिया और सभी ने अपने–अपने विचार रखे ।
इस विषय की अध्यक्षता बामसेफ के वरिष्ठ कार्यकर्ता भानजी भाई राठौर ने की । उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा किए गए आंदोलन पर विस्तार से प्रकाश डाला, उन्होंने कहा कि बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने एक दिन का आंदोलन करके सफलता दिलाई, किसानों ने 13 महिनों से अधिक आंदोलन किया फिर भी सरकार की आंख नहीं खुली, किसानों ने जिनकी सरकार बनाई वो देना ही कुछ नहीं चाहते थे, जो देना ही कुछ नहीं चाहते, हम उन्हीं से मांग रहे हैं । महात्मा गांधी ने लम्बे–लम्बे आंदोलन चलाए लेकिन महात्मा गांधी ने गैर–बराबरी की व्यवस्था के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं चलाया, उन्होंने स्वदेशी आंदोलन चलाया और कहा कि हम तुम्हारा माल नही खरीदेंगे । हमें भी अपनी व्यवस्था को खड़ी करने के लिए ऐसे मजबूत आंदोलन को खड़ा करने की आवश्यकता है । मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन खड़ा करना होगा । डर की राजनीति ब्राह्मण करते हैं, पहले वे डराते हैं फिर डर का लाभ उठाते हैं खुद का फायदा करते हैं, बाकि का जी भरकर शोषण करते हैं । हमें अपने मुद्दों पर ही आंदोलन करना चाहिए, इसलिए मुद्दा हमारा ही होना चाहिए, जन आंदोलन के लिए हमें अनेक पहलुओं पर काम करना होगा ।
बामसेफ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ– संजय इंगोले ने कहा कि हमें सोचना चाहिए कि अभी हम क्या कर सकते हैं ? संसद में वर्तमान में जो निर्णय लिए जा रहे हैं, वे हमारे हित में नहीं है, जन आक्रोश के माध्यम से जिसे हम रोक सकते हैं, उसे रोकना चाहिए । रोकने के लिए हमें हमारे साथियों को जोड़ना पड़ेगा, इसलिए हमें आज सभी को जोड़ना चाहिए । हर प्रकार के कार्य करने वालों पर सरकार की नीतियों का असर है । निर्णय प्रक्रिया को आप विचार से और बुद्धि से भी प्रभावित कर सकते हैं । बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने उस समय की सरकार को प्रभावित किया, ब्राह्मण जो व्यवहार में लागू नहीं कर रहे थे, उस समय की सरकार के सामने अपना प्रस्ताव रखा और प्रभावित किया तथा व्यवहार में लागू करवाया ।
बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने खेती के राष्ट्रीयकरण का सुझाव दिया था और सामूहिक खेती पर भी बल दिया था, उद्योगों के राष्ट्रीयकरण की भी आवश्यकता बताई थी ।
संयुक्त जन आंदोलन के मुद्दों व रणनीतियों पर बामसेफ एक समूह के राष्ट्रीय अध्यक्ष मू– अतरवीर ने कहा कि बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने हमें लक्ष्य को बता दिया था, गोल सैट कर दिया था, हमें उस गोल को समझना चाहिए कि उनका गोल क्या था, इस पर हमें बहस करनी चाहिए, हम बहस से क्यों बचना चाहते हैं ? सामाजिक लोकतंत्र कैसे स्थापित होगा ? इस पर हमें डिबेट करनी चाहिए । क्रांति कैसे होगी, इस पर हमें काम करने की आवश्यकता है ।
मूलनिवासी एच– के– बैरवा ने कहा कि हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि लोग उद्देश्य के अनुरूप इकट्ठा होते हैं हमें व्यवस्था परिवर्तन के लिए दर्शन को समझना चाहिए । दर्शन से विधान बदलता है और विधान से प्रतीक बदलते हैं ।
इसके पश्चात खुली चर्चा आयोजित की गई, जिस पर सभी ने अपने अपने विचार रखे । अगले दिन 22 मार्च को पिछले दिन के संकल्पों का सारांश मू– सुरेश द्रविड़ ने रखा और सभी ने बारी–बारी अपनी–अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की । इस सत्र की अध्यक्षता भारतीय स्वाभिमानी संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष मू– एच एन रेकवाल ने की, उन्होंने कहा कि हम सबको मिलकर यह देखने की आवश्यकता है कि हम सभी का कितने जिलों में नेटवर्क है ? कर्मचारियों को छोड़कर हमारे साथ कितने लोग जन–आंदोलन के लिए तैयार है, प्रशासन के पास से अनुमति लेने का भी अनुभव हमारे पास नहीं है, इन सबके प्रशिक्षण के लिए हमें एक दिन का प्रशिक्षण रखना चाहिए । हमें इस ओर भी ध्यान देने की आवश्यकता है, वो कौन सी चीजें है जो हमें जोड़ने से रोक रही हैं ,जिला स्तर पर युवा, महिलाएं, छात्र और नौजवानों तथा किसानों, मजदूरों की भी आंदोलन में आवश्यकता है, उस ओर तो हम अभी तक काम ही नहीं कर रहे है । मैन पावर (मानव संसाधन) तैयार करना पड़ेगा । हमें इसके लिए ठोस योजना बनानी चाहिए, ओबीसी की जाति आधारित जनगणना को और अधिक महत्व देने की आवश्यकता है, स्थानीय लोकल मुद्दों पर भी हमें काम करना होगा, प्रचार सामग्री का पूरी तरह से प्रयोग करना होगा । 100–100 लोग प्रत्येक जिले में तैयार हों, इस योजना को अमलीजामा पहनाना चाहिए । हमें अधिक से अधिक मैन पावर जुटाने पर ध्यान देना चाहिए ।
विचार मंथन राष्ट्रीय समन्वय सहयोग तंत्र स्थापित करने संबंधी विषय पर अनेक साथियों ने अपने विचार रखे और अपनी–अपनी सलाह भी दी ।
इंसाफ के वरिष्ठ साथी मू- सी बी राहुल ने कहा कि मुझे बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि संगठनों को इकट्ठा करने के लिए भी संगठन बन गए है। क्या इतने संगठनों को इकट्ठा किया जा सकता है ? क्या नये नये बन रहे संगठनों को रोका जा सकता है, बिल्कुल नहीं रोका जा सकता, बहुत से लोग आपदा में अवसर ढुंढ रहे हैं, यह हमारे लिए आपदा ही है, हमें आज सभी संगठनों की बढाई करने की आवश्यकता है,कामन काज की धारणा पैदा करें, सभी की बढाई करें, सभी के साथ सहयोग करें। चर्चा परिचर्चा के पश्चात मू– सुरेश द्रविड़ को राष्ट्रीय संयोजक, मू– महादेव कांबले को महासचिव, मू– जी के शर्मा, मू– एच एन रेकवाल, मू– आर के तिलवालिया, मू– मुकेश कर्मा, मू– मंगल चंद हांसदा, मू– डॉ संजय इंगोले, मू– आर के विधार्थी, मू– आदित्य प्रधान, मू– एडवोकेट संदीप टांक, मू– मनीष पांचाल, मू– डॉ वेदप्रकाश खोबड़ा, मू– डॉ सत्येन्द्र कुमार, मू– आलोक शास्त्री, मू– वासुदेव शर्मा, मू– चित्रा गायकवाड़, मू– जगदीश चन्द्र सिंघल, मू– अजीत कुमार, मू– मोली राम, मू– मनी कुमार, मू– सरदार बलविंदर सिंह आदि को सदस्य मनोनीत किया गया ।
इसके बाद एक रिसर्च कमेटी भी बनाई गई, जिसमें मू– एस आर मौर्या जी को चेयरमैन, मू– एस पी करवाल, मू– अमृत लाल, मू– वाई वैंकैया, मू– डॉ विश्वजीत, मू– डॉ सत्येन्द्र ठाकुर, मू– एडवोकेट बाबू राम, मू– डी डी आंनद को रिसर्च कमेटी के सदस्य के तौर पर मनोनीत किया गया ।
बामसेफ के एक समूह के राष्ट्रीय अध्यक्ष एस पी करवाल ने कहा कि समन्वय और सहयोग क्यों चाहिए ? इसका मतलब हमारी कोई समस्या है, उसका समाधान करने के लिए सहयोग और समन्वय की आवश्यकता है । हमें इसके लिए एस आर मौर्या जी के उस कथन को महत्व देना होगा कि हमें इसके लिए ‘‘ बड़ा दिल, बड़ी सोच चाहिए’’, बड़ा दिल बड़ी सोच से ही हमारी समस्याओं का समाधान होगा । महापुरुषों की विचारधारा से परिवर्तनकारी, क्रांतिकारी स्वरूप प्रदान करना होगा, समन्वय से शक्ति निर्माण की ओर बढ़ना चाहिए । समन्वय के प्रकारों पर प्रकाश डालते हुए आपने कहा कि हमें सामाजिक संगठनों का समन्वय, धार्मिक संगठनों का समन्वय, सांस्कृतिक संगठनों का समन्वय, कल्याणकारी संगठनों का समन्वय, राजनैतिक संगठनों का समन्वय, शैक्षिक संस्थाओं और संगठनों के समन्वय की ओर भी बढ़ना होगा । हमें तीन स्टैप की ओर बढ़ना चाहिए 1– सहयोग, 2–गठजोड़, 3–एकीकरण ।
हमारी राष्ट्रव्यापी समस्या है इसके लिए हमें राष्ट्रव्यापी संगठन चाहिए । हमें इसकी सफलता के लिए जातीय पहचान से मोहभंग करना पड़ेगा, एक स्टेट से दूसरे स्टेट के बीच समन्वय स्थापित करना होगा, समन्वय का प्रोग्राम मजबूती से चलाना चाहिए, हर जिले में पांच ट्रैंड कार्यकर्ता होने चाहिए, 10–15 विंग्स और बनानी चाहिए ।
जन संगठनों के साथ प्रभावी समन्वय स्थापित करने और संयुक्त जन कार्रवाई कार्यक्रमों (जेएमएपी) को क्रियान्वित करने के लिए निम्नलिखित समितियों का गठन किया गया है ।
(1) कार्यक्रम आयोजन समिति %
कार्य–1– राज्य स्तर और जिला स्तर पर इसकी संरचना विकसित करना ।
2– विस्तृत चर्चा के बाद जन आंदोलन कार्यक्रम तैयार करें और उसे क्रियान्वित करें ।
(2) अनुसंधान समिति % कार्य– समन्वयकों/कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए पाठ्यक्रम पर शोध करना और उसे विकसित करना ।
समितियां अपने कार्यक्षेत्र और कार्य योजना पर निर्णय लेने के लिए एक महीने के भीतर अपनी बैठकें आयोजित करेंगी ।
समितियों द्वारा समाज के विद्वान सदस्यों से सुझाव मांगे जाएंगे ।
समितियां इच्छुक सदस्यों को शामिल करेंगी और अपने आकार और कार्यक्षेत्र का विस्तार करेंगी ।
उपरोक्त निर्णय लेने के बाद चर्चा और निर्णय के लिए कोई अन्य अत्यावश्यक मुद्दे नहीं बचे, इसलिए बैठक औपचारिक धन्यवाद प्रस्ताव के साथ समाप्त हुई । इस अवसर पर मू– जागृति किशोर, मू– सी बी राहुल, मू– जे– सी– सिंघल, मू– राजसिंह मैहरा, मू– पवन कुमार, मू– अमित कुमार तंवर, मू– जगदीश मीणा, बी सी एल 24 टीवी, नागवंशी टीवी, एसएस बहुजन टीवी, ब्लयू मून चैनल, मू– लॉर्ड हांगकांग, मू– डॉ– सत्येन्द्र कुमार, मू– जी– डी– दिवाकर, मू– ललित कुमार, मू– एडवोकेट बाबूराम, मू– इंजि– एस–पी– करवाल, मू– बलविन्द्र सिंह, मू– विनोद भूषण दहिया, मू– मनीकुमार, मू– भीक्खू करूणाशील राहुल, मू– भन्ते आसगी, मू– विकास कुमार खोबड़ा, मू– चुन्नी लाल, मू– अली, मू– जी सी सेलहन, मू– अमृतलाल, मू– जी– एल– वर्मा, मू– बीरसिंह, मू– सूरजपाल सिंह, मू– एमएस सिंघल, मू– डी एस रंगा, मू– श्याम मेघवाल, मू– परमानन्द प्रसाद, मू– जितेन्द्र कुमार, मू– मानव गांवडे, मू– रमेश कुमार, मू– ब्रहम सिंह, मू– सचिन कुमार, मू– मुकेश कर्मा, मू– एम सी हांसदा, मू– संधीर कुमार, मू– निलेश वाग्दे, मू– सुरेश शक्ति अम्बेडकर, मू– डॉ देशराज, मू– आर– के– तिलवालिया, मू– अतरवीर, मू– नवाब सिंह, मू– मनीष कुमार, मू– दीपक पांचाल, मू– डॉ– वेदप्रकाश खोबड़ा, मू– सुभाष कुन्डू, मू– एच– के– बैरवा, मू– जी–के– शर्मा, मू– डॉ– राजेश कुमार, मू– डॉ– राजेन्द्र सिंह, मू– ईश्वर चन्द्र, मू– ब्रजेन्द्र कुमार, मू– प्रदीप चैहान, मू– एडवोकेट संदीप टांक, मू– डॉ विश्वजीत सिंह, मू– महादेव कांबले, मू– एच एन रेकवाल, मू– भानजी भाई राठौर, मू– सुधीर राज सिंह, मू– दिनेश कुमार, मू– राकेश कुमार,संधीर बौद्ध आदि उपस्थित रहे ।

