मुख्यमंत्री जी, सुनो,
कुर्सी पर बैठे हो,
कुर्सी सलामत रहेगी,
अगर इंसाफ जिंदा रहा।
17साल का नाबालिक लड़का था,
वोटर लिस्ट में नाम भी न था।
कीलें ठोक दीं जिस्म में,
संविधान के सीने में।
तुम कहते हो “सुशासन”,
हम पूछते हैं “कहाँ है”?
लाश के नाखून गिन लो,
हर नाखून पे सवाल है।
FIR की स्याही सूख रही है,
गवाह की जुबान डर रही है।
फास्ट ट्रैक का वादा था,
तारीख पे तारीख चढ़ रही है।
सुनो हुक्मरान,
इतिहास तुम्हें तोलेगा –
जयचंद के पन्ने पर नहीं,
केतन के कफन पर।
फांसी मांगता है गांव,
फांसी मांगती है राख।
जेल में बंद करने से पेट नहीं भरता,
जब भूख इंसाफ की हो।
बुलडोजर चलाओ,
पर ईंट पर नहीं,
उस सोच पर चलाओ,
जो बच्चे को कील समझे।
मुख्यमंत्री जी,
कलम तुम्हारे हाथ में है,
इतिहास का फैसला भी।
या तो केतन के साथ खड़े हो जाओ,
या कुर्सी के साथ खमोश हो जाओ।
ये वंचितों की जुबान है,
जो सच बोले तो गूंजे।
केतन को इंसाफ दो,
वरना अगली कविता,
तुम्हारे इस्तीफे पर होगी।
गंगा शाह
संवाददाता नईं टिहरी

