रामनगर (नैनीताल) आज रामनगर जिला नैनीताल के निकटवर्ती वन ग्राम मे (खत्ता ग्राम)पुछडी में अनेक दशकों से निवास कर रहे,भारत तथा उत्तराखंड के मूल निवासी सर्वहारा भूमि तथा आवास विहीन दलित ,पिछडे तथा धार्मिक अल्पसंख्यकों के हजारों आशियानों को बुलडोजर से नेस्तनाबूद किया जा रहा है।और इस तबाही को कवरेज के लिए मीडिया कर्मियों का प्रवेश वर्जित एवं दण्डनीय कर दिया गया है यह वह तानाशाही है जहां प्रेस की स्वतंत्रता खत्म हुई है।इस विध्वंस के लिए वन विभाग की टीमों के साथ सम्पूर्ण उत्तराखंड प्रवेश से हजारों की तादाद मे पुलिस कर्मी,दर्जनो बुलडोजर तांडव मचा रहे है।अभी कुछ ही दिनों बाद भारत का सबसे बडा धार्मिक पर्व दीपावली है,लोग अपने घरो को सजा रहे हैं,लेकिन हमारी सरकार बुलडोजर से इनका आशियाना छीन/मिटाकर कौन सा तोहफा दे रही है, समझ मे नहीं आया।दूसरी ओर शादियों का सीजन है, कई घरों मे खुशियों की शहनाई बजनी थी उन दिलों मे कितना मातम हैं क्रंदन है,हम किस प्रदेश , देश ,महाद्वीप या किस ग्रह जीव हैं समझ मे नहीं आया।यहां इन्सानियत मिट चुकी है।
रामनगर (नैनीताल) का वजूद स्वाधीनता प्राप्ति के पूर्व के दो अंग्रेजो के कारण विश्व के मानचित्र मे चमकता हैं।जिनमे पहला नाम है तत्कालीन कुमाऊँ कमीश्नर रैम जे का( कार्यकाल 1856-1884)सर रैमजे ने अपने कार्यकाल मे जन अपेक्षाओ का सम्मान करते हुए गूलर का जंगल काटकर एक सुन्दर वर्गाकार/आयताकार नगर का निर्माण किया।जिसकी सभी गलियां समकोण पर कटती थी।उस सुन्दर शहर/ व्यापारिक मंडी का नाम कमिश्नर साहब के नाम पर रैमनगर रखा गया।कालांतर मे यहीं शहर रामनगर हो गया।जो कि कुमाऊँ-मंडल के सल्ट, ककलासौं, सिलोर धुराफाट,बेतालघाट, कोटाबाग,गढ़वाल मण्डल के प्रमुख स्थानों,तराई के काशीपुर, बाज़ार, जयपुर के व्यापारियों की प्रमुख मंडी बन गयी। रामनगर शहर के स्थापित होने से पहले ही रामनगर के चारो ओर अनेक राजस्व गाँव थे।जिनमे ढिकुली और चिल्किया ऐतिहासिक गाँव हैं।इसके अलावा अन्य दर्जनों गाँव रामनगर के बनने से कई बर्ष पहले वस गये थे ।पहाड के लोग जाडों मे अपने मवेशियों के साथ रामनगर के इर्द-गिर्द वस जाते थे और गर्मी के मौसम मे पहाड चले जाते थे और कुछ लोग रह जाते थे। भाबर मे इनके वास स्थलो को खत्ता गाँव कहा जाता था।लेकिन अफसोस इन गाँवोंका विनियमितीकरण न तो अंग्रेज सरकार ने किया न ही आजादी के बाद पूर्ववर्ती सरकारों ने। हां इतना जरूर उन्होने उजाडा भी नहीं।
आजादी के बाद उत्तराखंड के अनुसूचित जाति जनजाति के लोग जो भूमिहीन है, या खैकर सिरत्वान थे के लिए मालधन चौड के अलावा कहीं भी भूमि नहीं दी गयी।मालधन चौड मे भी सम्पूर्ण उत्तराखंड + उ.प्र . के मात्र 503 परिवारों को 5-5 एकड भूमि दी गयी।मालधन चौड के इर्द-गिर्द आज लगभग बीस हजार अनुसूचित जाति के भूमिहीन परिवार वन भूमि मे निवास कर रहे हैं।
दूसरे जिस अंग्रेज के नाम से रामनगर का महत्व है वह है शिकारी जिम कार्बेट उन्ही के नाम से रामनगर के पास विश्व प्रसिद्ध जिम कार्बेट टाइगर रिजर्व नेशनल पार्क हैं,इसी पार्क के कारण रामनगर विश्व विख्यात पर्यटन स्थल है।इस सबके बावजूद रामनगर का विकास जो अवरूद्ध हुआ है उसका कारण भी कार्बेट नेशनल पार्क है।रामनगर शहर और गांव पार्क के कारण सिमट रहे है और डर रहे है,कई गाँवो का विस्थापन हो चुका है।कुमाऊँ-मंडल को गढ़वाल मण्डल से जोडने वाला कंडी मार्ग कार्बेट नेशनल पार्क के भेट चढ चुका है। गाँव की उपजाऊ जमीन पर होटल और रिसोर्टो की बाढ आ गयी है।
अनेकानेक वन गाँवों पर पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हजारो सर्वहारा लोगों के घरों को उजाड़ने के लिए बुलडोजर गरज रहे है।गरीबों का पर्यावरण संरक्षण के नाम पर मिटाने वाली सरकार अमीरों के लिए अरावली पर्वत श्रंखला को काटकर समतल बना रही है।
यह किसका भारत है? जहां हमारा मिट रहा नामोनिशान है। आपका क्या विचार हैं? बताना जरा।
राजाराम विद्यार्थी
31 10 2026

