एक तरफ देश में राजनीतिक व्यक्तित्वों का महिमामंडन अपने चरम पर दिखाई देता है, तो दूसरी तरफ आम जनता अपने बुनियादी सवालों के जवाब तलाश रही है। छात्र शिक्षा और रोजगार की चिंता में हैं, किसान खेती की बढ़ती लागत और आय की समस्या से जूझ रहा है, दलित और आदिवासी समाज सामाजिक न्याय और सम्मान के सवाल उठा रहा है। महंगाई ने आम परिवार की रसोई का बजट बिगाड़ा है, बेरोजगारी युवाओं के भविष्य को लेकर बेचैनी पैदा कर रही है और अनेक क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति आज भी चिंता का विषय बनी हुई है।
ऐसे दौर में लोकतंत्र के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीति का केंद्र जनता की समस्याएं होंगी या नेताओं की नायक-पूजा?
सामने आई तस्वीर इसी सवाल को जन्म देती है, जिसमें एक राजनीतिक व्यक्तित्व को विशेष स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है। किसी नेता का सम्मान करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन जब सम्मान की सीमा पार करके राजनीतिक व्यक्ति को देवत्व प्रदान करने की कोशिश होने लगे, तब बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की चेतावनी को याद करना जरूरी हो जाता है।
बाबासाहेब ने राजनीति में भक्ति से क्यों सावधान किया था?
25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने ऐतिहासिक भाषण में बाबासाहेब अम्बेडकर ने राजनीति में भक्ति या नायक-पूजा के खतरे की ओर देश को चेताया था। उनका विचार था कि राजनीति में किसी व्यक्ति के प्रति अंधभक्ति लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरा बन सकती है और अंततः निरंकुशता का रास्ता खोल सकती है।
बाबासाहेब का लोकतंत्र किसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमने वाला लोकतंत्र नहीं था। उनका लोकतंत्र संविधान, नागरिक अधिकार, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व पर आधारित था।
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि नेता कितना बड़ा है।
सवाल यह होना चाहिए कि जनता के लिए उसने कितना काम किया?
राम के नाम पर राजनीति और पेरियार की असहमति
यहां एक दूसरा महत्वपूर्ण वैचारिक पक्ष भी सामने आता है। दक्षिण भारत के तर्कवादी और सामाजिक न्याय आंदोलन के प्रमुख विचारक ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ ने रामायण और राम के चरित्र को धार्मिक आस्था के बजाय तर्क, सामाजिक सत्ता-संबंधों और राजनीति के नजरिए से देखने की चुनौती दी।
पेरियार ने अपनी चर्चित कृति ‘रामायण—ए ट्रू रीडिंग’ में प्रचलित रामकथा की आलोचनात्मक व्याख्या की। वे रामायण को ऐतिहासिक सत्य मानने के बजाय उसके सामाजिक और राजनीतिक अर्थों की पड़ताल करते थे। उनकी दृष्टि में रामायण की कथा को केवल धार्मिक श्रद्धा से नहीं, बल्कि तर्क और आलोचनात्मक विवेक से भी पढ़ा जाना चाहिए।
यही वह जगह है जहां पेरियार का सवाल आज की राजनीति से जुड़ता है—
यदि कोई धार्मिक कथा आस्था का विषय है, तो उसे राजनीति में किसी जीवित नेता की छवि को देवत्व देने के लिए क्यों इस्तेमाल किया जाए?
ललई सिंह यादव ने इस बहस को हिंदी पट्टी तक पहुंचाया
पेरियार की ‘सच्ची रामायण’ को हिंदी में प्रकाशित करने का महत्वपूर्ण कार्य सामाजिक न्याय के चिंतक ललई सिंह यादव ने किया। 1968 में हिंदी में ‘सच्ची रामायण’ प्रकाशित हुई। इसके बाद इस पुस्तक को लेकर उत्तर प्रदेश में विवाद हुआ और सरकार ने इसके प्रकाशन पर कार्रवाई की। ललई सिंह यादव ने इस कार्रवाई को न्यायालय में चुनौती दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी जब्ती आदेश को निरस्त किया और बाद में 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने भी राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।
इस पूरे प्रसंग का महत्व केवल ‘सच्ची रामायण’ के विवाद में नहीं है। इसका बड़ा संदेश विचार की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार से जुड़ा है।
यानी एक तरफ धार्मिक आस्था का सम्मान और दूसरी तरफ किसी कथा को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ने की स्वतंत्रता—दोनों प्रश्न लोकतंत्र में मौजूद रह सकते हैं।
आस्था निजी हो सकती है, सत्ता सार्वजनिक है
किसी व्यक्ति की राम में आस्था है, वह उसका निजी विश्वास है और उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन जब किसी राजनीतिक नेता की छवि को भगवान के स्वरूप में प्रस्तुत करके उसे राजनीतिक वैधता या आलोचना से ऊपर उठाने का प्रयास किया जाए, तब सवाल उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है।
आस्था का सम्मान हो, लेकिन राजनीति में विवेक भी जीवित रहना चाहिए।
राम को मानने वाला व्यक्ति भी सवाल पूछ सकता है। राम को न मानने वाला व्यक्ति भी संविधान का सम्मान कर सकता है। किसी धार्मिक आस्था को मानना या न मानना नागरिक स्वतंत्रता का विषय है; लेकिन किसी राजनीतिक व्यक्ति को देवत्व प्रदान करना लोकतांत्रिक जवाबदेही का विकल्प नहीं हो सकता।
जब किसान परेशान हो तो तस्वीर से ज्यादा जरूरी उसका सवाल है
देश के किसान को सम्मानजनक आय चाहिए।
युवा को रोजगार चाहिए।
छात्र को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए।
गरीब को इलाज चाहिए।
महिला को सुरक्षा और सम्मान चाहिए।
दलित और आदिवासी समाज को संविधान प्रदत्त अधिकारों का वास्तविक संरक्षण चाहिए।
आम आदमी को महंगाई से राहत चाहिए।
तो फिर राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा क्या होना चाहिए?
किसी नेता की पूजा या जनता की समस्याएं?
लोकतंत्र में जनता ने नेताओं को भगवान बनाने के लिए सत्ता नहीं दी है। जनता ने उन्हें जनसेवा और संविधान के अनुसार शासन करने के लिए चुना है।
बाबासाहेब को मानना है तो सवाल पूछना सीखिए
आज बाबासाहेब की प्रतिमाओं पर मालाएं चढ़ती हैं, उनके नाम पर कार्यक्रम होते हैं और उनके विचारों का उल्लेख किया जाता है। लेकिन बाबासाहेब को वास्तव में समझना है तो उनकी सबसे बड़ी सीख को आत्मसात करना होगा—
स्वतंत्र चिंतन।
बाबासाहेब हमें किसी व्यक्ति के पीछे आंख बंद करके चलना नहीं सिखाते। वे हमें संविधान पढ़ने, अधिकार समझने, तर्क करने और सत्ता से सवाल पूछने की लोकतांत्रिक चेतना देते हैं।
इसलिए बाबासाहेब की सच्ची श्रद्धांजलि किसी नेता की अंधभक्ति नहीं, बल्कि संविधान के प्रति निष्ठा और जनता के प्रति जवाबदेही है।
लोकतंत्र का असली नायक कौन?
लोकतंत्र में नायक हो सकते हैं, लोकप्रिय नेता हो सकते हैं, महान व्यक्तित्व हो सकते हैं—लेकिन कोई भी व्यक्ति संविधान से बड़ा नहीं हो सकता।
व्यक्ति आएंगे और जाएंगे।
सरकारें बनेंगी और बदलेंगी।
राजनीतिक दल सत्ता में आएंगे और विपक्ष में जाएंगे।
लेकिन संविधान और नागरिकों के अधिकार बने रहने चाहिए।
इसलिए आज जरूरत है कि हम नायक-पूजा से ऊपर उठकर नागरिक चेतना की बात करें।
नेता की तस्वीर बड़ी होने से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता की आवाज बड़ी होती है।
और बाबासाहेब की चेतावनी को आज फिर याद करने की जरूरत है—
राजनीति में भक्ति नहीं, विवेक चाहिए।
व्यक्ति-पूजा नहीं, संवैधानिक चेतना चाहिए।
अंधसमर्थन नहीं, जवाबदेही चाहिए।
और सबसे ऊपर—किसी व्यक्ति को नहीं, संविधान को सर्वोच्च मानना चाहिए।
यही बाबासाहेब के लोकतांत्रिक चिंतन का सार है और यही आज के भारत की सबसे बड़ी जरूरत भी।
गंगा शाह ‘आशुकवि’
पत्रकार

