वोट चोरी की चिंता, जातिगत हिंसा पर खामोशी क्यों?
गंगा शाह आशुकवि की कलम से
देश में कांग्रेस सहित विभिन्न राजनीतिक दल वोट चोरी और लोकतंत्र की रक्षा को लेकर आवाज उठा रहे हैं। चुनावी पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन सवाल यह भी है कि देशभर में बढ़ती जातिगत हिंसा, छुआछूत और अनुसूचित जाति के लोगों के खिलाफ होने वाले जघन्य अपराधों पर उतनी ही गंभीरता क्यों नहीं दिखाई देती?
जब वोट देने वाले नागरिक की गरिमा और सुरक्षा ही खतरे में हो, तो लोकतंत्र की रक्षा की लड़ाई अधूरी नहीं रह जाती?
डॉ. भीमराव आंबेडकर के संविधान ने प्रत्येक नागरिक को समानता और सम्मान का अधिकार दिया है। इसके बावजूद जाति के नाम पर भेदभाव और अत्याचार की घटनाएं समाज के सामने गंभीर चुनौती बनी हुई हैं।
कांग्रेस हो या अन्य राजनीतिक दल, सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—सभी को जातिगत हिंसा के मामलों में पीड़ितों को न्याय दिलाने, निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग मजबूती से उठानी चाहिए।
लोकतंत्र केवल वोट से नहीं, बल्कि समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व से मजबूत होता है।
वोट चोरी पर सवाल उठाइए, लेकिन जातिगत हिंसा पर भी खामोश मत रहिए। हमें वोट का अधिकार भी चाहिए और सम्मान के साथ जीने का अधिकार भी।
✍️ गंगा शाह आशुकवि
पत्रकार, नई टिहरी | उत्तराखंड

