टिहरी गढ़वाल नई टिहरी में केतन लाल प्रकरण को लेकर सबसे बड़ा सवाल अब केवल एक घटना का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि आखिर घटना की पूरी कहानी जनता के सामने कब आएगी?
दिवाकर डिमरी के मामले में लगातार यह आरोप उठ रहे हैं कि एक पक्ष की कहानी को पहले से स्थापित करने की कोशिश की गई, जबकि दूसरी तरफ मौजूद फोन कॉल, संदेश, घटनास्थल की परिस्थितियां और गंभीर सवालों को सार्वजनिक बहस से दूर रखा गया।
सबसे पहला सवाल प्रशासन और जांच एजेंसियों से है—
यदि दिवाकर डिमरी और केतन लाल को फोन या संदेश के माध्यम से बुलाया गया था, तो उन कॉल डिटेल्स, संदेशों और डिजिटल साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही?
किसी भी मामले में अफवाह और सत्य के बीच फर्क जांच से तय होता है। इसलिए केवल सोशल मीडिया पर चल रहे दावों या एकतरफा कथाओं के आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी घोषित कर देना न्याय की प्रक्रिया नहीं हो सकती।
कुछ लोगों ने सोशल मीडिया के माध्यम से यह धारणा फैलाने की कोशिश की कि दिवाकर डिमरी बिना किसी पूर्व परिचय के रात में किसी घर में अपराध करने पहुंचा। लेकिन दूसरी ओर यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या दिवाकर डिमरी और अन्य लोगों को पहले फोन कर वहां बुलाया गया था?
यदि बुलाया गया था, तो फिर सवालों को दबाने के बजाय उस फोन कॉल और संदेश की निष्पक्ष जांच सार्वजनिक होनी चाहिए।
आखिर कोई व्यक्ति बिना किसी जान-पहचान के अचानक किसी के घर क्यों जाएगा? यदि दोनों पक्षों के बीच पहले से संपर्क था, यदि फोन पर बातचीत हुई थी और यदि किसी ने बुलाया था, तो जांच का केंद्र इन तथ्यों पर भी होना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि घटना के समय वहां अन्य लोग कैसे पहुंचे?
यदि यह एक अचानक हुई घटना थी, तो कथित रूप से अन्य लोगों का वहां पहुंचना किन परिस्थितियों में हुआ? क्या वे पहले से मौजूद थे? क्या उन्हें भी किसी ने बुलाया था? क्या पूरी घटना के पीछे कोई पूर्व नियोजित योजना थी?
ये सवाल केवल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि उसी घटनाक्रम में नाबालिग छात्र केतन लाल की मौत हुई और दिवाकर डिमरी के घायल होने की बात भी सामने आई।
दिवाकर डिमरी के समर्थकों और परिजनों का आरोप है कि उन्हें गंभीर रूप से घायल किया गया और बाद में उन्हीं के खिलाफ गंभीर आपराधिक आरोपों की दिशा में मामला मोड़ दिया गया। इन आरोपों की सच्चाई का निर्धारण निष्पक्ष जांच और सार्वजनिक होना चाहिए।
लेकिन यदि कोई व्यक्ति गंभीर रूप से घायल था, तो यह जांच का विषय जरूर होना चाहिए कि उसे चोटें कैसे लगीं, किसने पहुंचाईं और उस समय घटनास्थल पर कौन-कौन मौजूद था।
इसी तरह केतन लाल की मौत की पूरी परिस्थितियां भी उतनी ही गंभीरता से सामने आनी चाहिएं। यदि परिवार और समर्थकों का आरोप है कि पहले से किसी योजना के तहत लोगों को वहां बुलाया गया, उनके साथ मारपीट हुई और उसी दौरान केतन लाल की मौत हुई, तो इस कोण की भी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
सवाल दबाने से सच्चाई खत्म नहीं होती।
आज जरूरत किसी भी पक्ष की सोशल मीडिया अदालत चलाने की नहीं है। जरूरत है कि—
– संबंधित फोन कॉल और संदेशों की फोरेंसिक जांच हो।
– घटनास्थल पर मौजूद सभी लोगों की भूमिका की जांच हो।
– वहां पहुंचे अन्य व्यक्तियों के पहुंचने की परिस्थितियां स्पष्ट की जाएं।
– दिवाकर डिमरी को लगी चोटों की स्वतंत्र जांच हो।
– केतन लाल की मौत की पूरी परिस्थितियां सामने लाई जाएं।
– डिजिटल साक्ष्यों से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ की जांच हो।
– यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति या उसके रिश्तेदार की भूमिका सामने आती है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच हो।
किसी भी व्यक्ति को केवल इसलिए दोषी नहीं माना जा सकता कि सोशल मीडिया पर उसके खिलाफ एक कहानी बार-बार दोहराई जा रही है।
सोशल मीडिया की अफवाह न्यायालय का फैसला नहीं होती।
सत्य यदि किसी के पक्ष में है, तो उसे जांच से डरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। और यदि वास्तव में कोई अपराधिक षड्यंत्र हुआ है, तो उसकी परतें भी जांच से ही खुलेंगी।
दिवाकर डिमरी दोषी हैं या निर्दोष—इसका अंतिम फैसला निष्पक्ष सार्वजनिक जांच से होगा।
लेकिन जनता और समाज यह सवाल जरूर पूछ सकता है—
फोन कॉल और संदेश सार्वजनिक जांच के दायरे में कब आएंगे?
दिवाकर डिमरी को चोटें कैसे लगीं?
घटनास्थल पर अन्य लोग कैसे पहुंचे?
क्या सभी डिजिटल साक्ष्यों की निष्पक्ष जांच हुई?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या पूरी घटना की कहानी निष्पक्ष जांच के साथ सामने लाई जा रही है, या कुछ सवालों को जानबूझकर दबाया जा रहा है?
नई टिहरी के समाज को अफवाह नहीं, सत्य चाहिए।
केतन लाल की मौत का भी पूरा सच सामने आना चाहिए और दिवाकर डिमरी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
न्याय एकतरफा नहीं होता। न्याय का मतलब है—हर सबूत की जांच, हर सवाल का जवाब और हर निर्दोष को संरक्षण।
किसी निर्दोष को आपराधिक षड्यंत्र
के तहत फंसाया गया है या नहीं—इसका जवाब केवल निष्पक्ष जांच दे सकती है।
इसलिए प्रशासन से मांग है कि पूरे प्रकरण के फोन कॉल, संदेश, डिजिटल साक्ष्य और घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कर सत्य को जनता के सामने सार्वजनिक रूप से रखा जाए ताकि जनता यह जान सके की पुलिस एवं सीबी सीआईडी की कार्रवाई कितनी निष्पक्ष है वह सभी सामने रखा जाए।
गंगा शाह ‘आशु कवि’ पत्रकार, नई टिहरी

