उत्तराखंड की राजनीति में विकास के बड़े-बड़े दावे होते हैं। पहाड़, संस्कृति और विरासत की बातें होती हैं। लेकिन जब बात पहाड़ के मेहनतकश शिल्पकार समाज की ऐतिहासिक पहचान की आती है, तो सवाल उठता है—क्या सरकार को ‘शिल्पकार’ शब्द लिखने और बोलने में भी कोई राजनीतिक असहजता है?
उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास में ‘शिल्पकार’ कोई कल का दिया हुआ नाम नहीं है। यह पहाड़ के उस मेहनतकश समाज की ऐतिहासिक पहचान है, जिसने अपने हाथों के हुनर से गांवों, घरों और पहाड़ की जीवन-व्यवस्था को आकार दिया। फिर इस पहचान को सार्वजनिक विमर्श में मजबूती से स्वीकार करने से सरकारें क्यों बचती हैं?
आज भाजपा सत्ता में है। ऐसे में सवाल सीधे भाजपा सरकार से पूछा जाना चाहिए—जब आप संस्कृति और विरासत की बात करते हैं, तो क्या शिल्पकार समाज की ऐतिहासिक विरासत उस संस्कृति का हिस्सा नहीं है?
सरकारों के मंचों पर पहाड़ की संस्कृति का गुणगान खूब होता है, लेकिन संस्कृति केवल लोकगीत, पहनावे और पर्यटन तक सीमित नहीं है। संस्कृति उन हाथों की भी कहानी है, जिन्होंने पहाड़ को बनाया। अगर उन हाथों की पहचान को पीछे कर दिया जाए तो फिर संस्कृति की बात अधूरी है।
‘दलित’ शब्द का अपना व्यापक सामाजिक और राजनीतिक इतिहास है। सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। लेकिन उत्तराखंड के संदर्भ में ‘शिल्पकार’ की ऐतिहासिक पहचान को पीछे धकेलकर हर जगह केवल एक व्यापक राजनीतिक पहचान को प्रमुखता देना गंभीर सामाजिक विमर्श का विषय है।
भाजपा सरकार से सवाल है—क्या पहचान भी अब राजनीतिक सुविधा के हिसाब से तय होगी?
अगर सरकार वास्तव में सामाजिक समरसता की बात करती है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि शिल्पकार समाज के इतिहास, योगदान और पहचान को सरकारी दस्तावेजों, पाठ्यक्रमों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सार्वजनिक विमर्श में कितना स्थान मिला?
सिर्फ मंच से ‘सबका साथ’ कह देने से सामाजिक सम्मान नहीं मिलता। सम्मान तब दिखाई देता है जब इतिहास के हाशिये पर रखे गए समाजों की पहचान और योगदान को बराबरी से स्वीकार किया जाए।
यह भी याद रखना होगा कि किसी समुदाय को ‘शिल्पकार’ कहे जाने पर गर्व है तो उसे अपनी पहचान चुनने का पूरा अधिकार है। सरकार या कोई राजनीतिक संगठन यह तय नहीं कर सकता कि कोई समाज अपने इतिहास को किस नाम से याद करे।
बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने आत्मसम्मान और बराबरी की चेतना दी। इसलिए सवाल किसी शब्द को दूसरे शब्द के खिलाफ खड़ा करने का नहीं है। सवाल है—क्या हमें अपनी ऐतिहासिक पहचान पर स्वयं बोलने का अधिकार है या नहीं?
आज भाजपा सरकार के सामने यह सवाल खड़ा है कि वह शिल्पकार समाज को केवल चुनावी गणित का हिस्सा मानेगी या उसके इतिहास और आत्मसम्मान को भी उतनी ही गंभीरता देगी?
क्योंकि पहाड़ की राजनीति में लंबे समय से एक सुविधा दिखाई देती है—मेहनत करने वाले हाथ चुनाव के समय याद आते हैं, लेकिन इतिहास लिखते समय उनकी पहचान पीछे छूट जाती है।
अब यह नहीं चलेगा।
शिल्पकार कहना किसी के सामने झुकना नहीं है।
शिल्पकार कहना कमजोरी नहीं है।
शिल्पकार कहना शर्म नहीं है।
शिल्पकार कहना उस इतिहास को स्वीकार करना है, जिसे पहाड़ की मेहनतकश पीढ़ियों ने अपने खून-पसीने से लिखा है।
भाजपा सरकार को तय करना होगा कि वह इतिहास के इन मेहनतकश हाथों को केवल वोट बैंक की तरह देखेगी या सम्मानजनक ऐतिहासिक पहचान भी देगी।
मूल शब्द लिखने में शर्म कैसी?
जिस समाज ने पहाड़ गढ़ा, उसकी पहचान पर राजनीति क्यों?
यह सवाल आज सरकार से है।
यह सवाल सत्ता से है।
और यह सवाल उस पूरे राजनीतिक तंत्र से है, जो शिल्पकार समाज की मेहनत तो स्वीकार करता है, लेकिन उसकी पहचान पर चुप हो जाता है।
— गंगा शाह ‘आशु कवि’
पत्रकार, नई टिहरी

