टिहरी आज सामाजिक न्याय की लड़ाई के बीच एक गंभीर सवाल खड़ा है—क्या हम पीड़ित के साथ खड़े हैं, या फिर अपनी-अपनी राजनीतिक और वैचारिक पसंद के हिसाब से पीड़ितों के समर्थन का चयन कर रहे हैं?
रोहिणी घावरी जिस तरह अपनी बात सार्वजनिक रूप से रख रही हैं, वह उनका अधिकार है। लेकिन उनके समर्थन में खड़े लोगों की नीयत और उनके व्यापक सामाजिक सरोकारों पर सवाल उठाना भी स्वाभाविक है। यदि किसी पीड़ित की आवाज को समर्थन देने का आधार वास्तव में न्याय और समानता है, तो यही संवेदना हर उस परिवार के लिए दिखाई देनी चाहिए जो जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न या भय का सामना कर रहा है।
यही सवाल केतन लाल प्रकरण में भी सामने आता है।
टिहरी गढ़वाल के केतन लाल प्रकरण में परिवार लंबे समय से न्याय और निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर संघर्ष करता रहा। ऐसे मामलों में सबसे जरूरी बात यह है कि जांच निष्पक्ष हो, तथ्यों की पड़ताल हो और पीड़ित परिवार को भयमुक्त वातावरण मिले। किसी भी बच्चे, परिवार या समुदाय के न्याय की मांग को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
अगर हम वास्तव में वाल्मीकि, शिल्पकार, दलित और अन्य वंचित समाजों के अधिकारों की बात करते हैं, तो हमारी कसौटी व्यक्ति नहीं बल्कि न्याय होना चाहिए।
हाथरस जैसे मामलों में भी यही सवाल उठता है कि जब किसी वंचित परिवार को भय, सामाजिक दबाव या असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, तब क्या हमारी संवेदना उतनी ही मुखर रहती है? यदि नहीं, तो हमें अपने सामाजिक सरोकारों की ईमानदारी पर स्वयं विचार करना होगा।
किसी महिला का किसी राजनीतिक नेता के खिलाफ बोलना उसका लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन उस आवाज का इस्तेमाल किसी दूसरे व्यक्ति या संगठन को घेरने के लिए किया जा रहा है या नहीं—इसका फैसला भावनाओं से नहीं, तथ्यों और परिस्थितियों से होना चाहिए।
मेरी आपत्ति किसी व्यक्ति की आवाज से नहीं है। मेरी आपत्ति चयनात्मक न्याय से है।
यदि आज कोई व्यक्ति चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ बोल रहा है और इसलिए उसे व्यापक समर्थन मिल रहा है, तो सवाल यह होना चाहिए कि क्या वही समर्थन उस दिन भी मिलेगा जब वह किसी राजनीतिक विवाद से हटकर केवल अपने समाज और न्याय की बात करेगा?
और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—
केतन लाल को न्याय कब मिलेगा?
केतन लाल का मुद्दा किसी नेता को घेरने का हथियार नहीं बनना चाहिए। न ही किसी राजनीतिक दल या संगठन की प्रतिष्ठा बचाने का माध्यम। यह एक परिवार की न्याय की मांग है और इसे उसी गंभीरता से देखा जाना चाहिए।
हमें तय करना होगा कि हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ है या अन्याय के खिलाफ।
क्योंकि अगर हमारी आवाज केवल तब उठती है जब उससे हमारा राजनीतिक विरोधी कमजोर होता है, तो वह सामाजिक न्याय की आवाज नहीं, बल्कि राजनीति का विस्तार है।
केतन लाल को न्याय चाहिए—सहानुभूति नहीं, निष्पक्ष जांच चाहिए; राजनीति नहीं, न्याय चाहिए।
— गंगा शाह ‘आशु कवि’
स्वतंत्र पत्रकार नई टिहरी

