

बौद्ध तांत्रिक महासिद्ध “लुईपा” को ही “मच्छिंद्रनाथ” कहते हैं, जिन्होंने “कौलज्ञान निर्णय” ग्रंथ लिखा है| मुरैना का 64 योगिनी बौद्ध तांत्रिक मंदिर महासिद्ध लुईपा की प्रेरणा से ही बना है।(Charyageeti, Sukumar Sen, p. 20)
वज्रयानी बौद्ध परंपरा में भिक्षु को महासिद्ध और भिक्षुणी को योगिनी कहा जाता था। तिब्बती बौद्ध परंपरा में बौद्ध योगिनी को डाकिनी कहते है। वज्रयान में अष्टकोणी मंडल परंपरा बेहद प्रसिद्ध थीं, जिसमें 8×8 अर्थात 64 सिद्ध तथा योगिनी के मंडल महत्वपूर्ण समझे जाते थे। इस वज्रयानी मंडल संरचना के आधार पर 36 कुलीन तथा 96 कुलीन वंश परंपरा बौद्धों के अंदर विकसित हुई थी। मुरैना का 64 मंडल स्तरीय बौद्ध विहार भी इसी वज्रयानी संरचना के आधार पर बनाया गया था।
मध्यप्रदेश का मुरैना जिला प्राचीन काल से बौद्ध धर्म का गढ़ रहा है। मौर्य सम्राटों का गढ़ होने के कारण उस प्रदेश को मुरैना मतलब मोरियना नाम पड़ा है। प्रसिद्ध भरहुत स्तुप भी इसी मुरैना प्रदेश में स्थित है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल का प्राचीन नाम “सिरि पाल” अर्थात “बुद्ध की नगरी” था| प्लीनी द एल्डर ने उसे अपने प्रवास वर्णन में “सिरि पल्ली” कहा है| इसी तरह मुरैना शहर का प्राचीन नाम “मोरिय नगर” अर्थात मौर्य नगर था| (ASR, Vol. 9, p. 61)
मुरैना का प्रसिद्ध 64 योगिनी मंदिर इस तरह बौद्ध परंपरा का वज्रयानी बौद्ध महाविहार है, जिसे बौद्ध विद्वान लुईपा अर्थात मछिंद्रनाथ ने बनवाया था।
-डॉ. प्रताप चाटसे, प्रबुद्ध भारत मिशन



