

टिहरी गढ़वाल टिहरी गढ़वाल के बहुचर्चित केतन लाल प्रकरण में अब जांच से ज्यादा आंदोलन की साख पर चर्चा तेज हो गई है। परिजनों को न्याय दिलाने के लिए सत्तारूढ़ दल और सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले आंदोलन के कुछ चेहरों के भाजपा नेताओं से मिलकर गुलदस्ता भेंट करने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या आंदोलन सत्ता की दहलीज पर जाकर ठहर गया है।
केतन लाल मामले में अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी और निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर 31 अगस्त को नई टिहरी कलेक्ट्रेट में पीड़ित परिजनों और भीम आर्मी सहित कई शिल्पकार संगठनों ने धरना-प्रदर्शन किया था।
अब इसी आंदोलन से जुड़े होने का दावा करने वाले कुछ लोगों द्वारा भाजपा जनप्रतिनिधियों से मिलकर गुलदस्ता देने की तस्वीरें वायरल हुई हैं। इसको लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें लिखा है कि केवल नीला गमछा पहनने या स्वयं को अंबेडकरवादी कहलाने मात्र से वैचारिक प्रतिबद्धता साबित नहीं होती, असली कसौटी तो सत्ता से सवाल पूछने के साहस से तय होती है।
इस मुलाकात का उद्देश्य व्यक्तिगत था या नीजी स्वार्थ इस पर बहुजन समाज पार्टी के टिहरी गढ़वाल जिलाध्यक्ष भोला लाल जी ने गहरी चिंता जताई और कहा हम वर्षों से बहुजन मिशन की लड़ाई पहाड़ जद्दोजहद से लड़ रहे और बीच में ही हमारे साथी हमारे साथ अचानक धोका रच रहे हैं यह चिंता का विषय आने वाले समय इन चेहरों को पहाड़ के लोगों पहचाना जरूरी है और इनका बहुजन मूवमेंट से अब कोई लेना देना नहीं है। बहुजन समाज पार्टी एवं भीम आर्मी के सभी पदाधिकारियों को इन लोगों पर ध्यान रखना चाहिए।
फिलहाल पीड़ित परिवार आज भी न्याय का इंतजार कर रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम पर ग़ालिब का एक शेर सटीक बैठता है –
“बे-लिबास आए थे इस दुनिया में ग़ालिब,
सिर्फ़ एक कफ़न के लिए इतना सफ़र कर गए…!”
ये शेर बताता है कि इंसान पूरी जिंदगी जिन पद, प्रतीक और सत्ता की दौड़ में भागता है, अंत में उसका हासिल सिर्फ एक कफन ही होता है। आंदोलन की सार्थकता भी अंततः गुलदस्तों में नहीं, बल्कि पीड़ित को मिले न्याय में ही तय होगी।
नई टिहरी, संवाददाता UCN गंगा शाह



