कोटद्वार गढ़वाल दिनांक 17 अक्टूबर 1881 को उन्नीसवीं सदी के अंतिम चरण में उत्तराखंड में जन्में क्रांतिकारी समाज सुधारक कर्मवीर जयानंद भारतीय की 146वीं जयंती के अवसर पर आज शैलशिल्पी विकास संगठन द्वारा सिम्मलचौड़ स्थित उत्तराखंड रत्न,कर्मवीर जयानंद भारतीय स्मृति पुस्तकालय में उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी गई।
संगठन के अध्यक्ष विकास कुमार आर्य ने कहा कि भारतीय जी ने स्त्री-शिक्षा, जातीयता का निर्मूलन, वंचित और कामगार शिल्पकार समाज के जीवन में मूलभूत परिवर्तन लाने जैसे समाज-सुधारों के लिये अपना पूरा जीवन लगाया, साथ ही देश की आजादी के लिए उन्होंने 6 बार जेल यात्राएं की, सही अर्थों में वे उत्तराखंड में सामाजिक क्रांति के अग्रदूत हैं, उन्होंने सामाजिक समता ,धार्मिक सहिष्णुता, आर्थिक न्याय और शोषण मुक्ति के लिये जीवन के अंतिम क्षण तक संघर्ष किया,वे आधुनिक उत्तराखंड के महान समाजचिंतक हुये जिन्होंने शोषित वंचित समाज पर हो रहे अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई ,रूढ़िवादी विचारों पर तथ्यात्मक आलोचना का चाबुक चलाया तथा विभन्न जातियों और पंथों के लोगों को भाईचारे की सीख दी ,उनकी धारणा थी कि शिक्षा हर दृष्टि से सभी सुधारों का द्वार है इसलिये उन्होंने महिलाओं के लिये अपने संघर्षों से शिक्षा के द्वार खुलवाए, उनके नेतृत्व में लगभग 20 वर्षों तक चलाया गया डोला-पालकी आंदोलन वंचित वर्गों के सामाजिक संघर्ष का प्रतीक है। लेकिन ये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि कर्मवीर जयानंद भारतीय जी जैसे युगपुरुष को जो सम्मान केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा दिया जाना चाहिय था वो सम्मान उन्हें अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है।
आर्य ने कहा कि शैलशिल्पी विकास संगठन भारत सरकार से माँग करता है कि उत्तराखंड रत्न, कर्मवीर जयानंद भारतीय को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया जाय।
सेवानिवृत्त रेंजर केशीराम निराला ने कहा कि भारतीय जी ने शिक्षा को वंचित समाज तक पहुंचाने एवं उनके मानवीय अधिकारों के लिए डोला-पालकी जैसे प्रसिद्ध आंदोलन का सूत्रपात किया एवं सामाजिक शोषण के खिलाफ वे वंचित वर्गों की आवाज बने।
इस अवसर पर शिव कुमार, धीरज धर बछवाण,अनिल कुमार, विनीता भारती, जगमोहन सिंह, राजीव कुमार, राकेश कुमार आदि लोग मौजूद रहे।

