कोटद्वार गढ़वाल उत्तराखंड के कोटद्वार में दो चर्चित प्रकरण पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं,एक तरफ अनुसूचित जाति के गरीब,मेहनतकश परिवारों पर तेजी से मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया जाता है, दूसरी तरफ शहर में खुलेआम अराजकता फैलाने वाले संगठित उपद्रवियों पर न सख्ती, न गिरफ्तारी,ये दोनों घटनाएं न केवल कानून की समानता पर सवाल उठाती हैं, बल्कि पुलिस की निष्पक्षता और संवेदनशीलता पर भी गहरा संदेह पैदा करती हैं।
पहला प्रकरण
देवरामपुर (मोटाढांक) — जातीय उत्पीड़न के शिकार गरीबों पर पुलिस की क्रूरता (22 अक्टूबर 2025)देवरामपुर (शिवराजपुर) में दशकों से बसे अनुसूचित जाति के दर्जनों परिवार दीपावली से पहले से ही जातिसूचक गालियों और पटाखों से आतंकित थे,19 अक्टूबर से कुछ युवकों ने बस्ती के निकट पटाखे छोड़कर, जातीय अपमान कर उन्हें डराने की कोशिश की,21 अक्टूबर को गंदी गालियां और बस्ती में आग लगाने की खुली धमकियां दी गईं।
22 अक्टूबर को पीड़ित महिलाओं-पुरुषों ने कोतवाली कोटद्वार में शिकायत की, लेकिन पुलिस ने इसे गंभीरता से नहीं लिया उल्टे नामजद आरोपियों ने उत्तर प्रदेश की जाफरा चौकी में उलटा तहरीर देकर पीड़ितों को फंसाने की कोशिश की।
रात में विवाद बढ़ने पर पहुंची पुलिस ने एकपक्षीय कार्रवाई की, महिलाओं के विरोध पर धक्का-मुक्की, डंडे से पीटा और धमकाया, महिलाओं के विरोध एवं आक्रोश का वीडियो वायरल हुआ, अगले दिन जब अनुसूचित जाति की दर्जनों महिलाएं और पुरुष जातीय उत्पीड़न की शिकायत लेकर थाने पहुंचे, तो पुलिस ने बदले की भावना से उन्हें हिरासत में ले लिया।
परिणाम स्वरूप 10 महिलाओं और 6 पुरुषों सहित कई लोगों पर संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर उन्हें पौड़ी जेल भेज दिया गया,गरीब मेहनतकश परिवारों को उनके घरों से उठा-उठाकर गिरफ्तार किया, गांव में आतंक फैलाया,मुख्य आरोपी — सामान्य जाति के दबंग आज भी खुलेआम घूम रहे हैं,
पीड़ितों को लगभग 3 महीने जेल काटनी पड़ी, बमुश्किल उन्हें हाईकोर्ट से जमानत मिली, लेकिन पुलिस की फुर्ती देखिए चंद घंटों में गरीबों पर मुकदमा और जेल जातीय उत्पीड़न की शिकायत को नजरअंदाज कर दिया गया।
यह पुलिस की पक्षपातपूर्ण और बदले की भावना से प्रेरित कार्रवाई का स्पष्ट उदाहरण है।
दूसरा प्रकरण बजरंग दल का हुड़दंग और पुलिस की नरमी (31 जनवरी 2026)
कोटद्वार के पटेल मार्ग पर ‘बाबा स्कूल ड्रेस’ दुकान के 70 वर्षीय मुस्लिम मालिक वकील अहमद पर 26 जनवरी को बजरंग दल के कुछ युवकों ने दबाव बनाया कि दुकान के नाम से “बाबा” शब्द हटाओ, क्योंकि तुम मुसलमान हो,विवाद बढ़ा तो जिम संचालक दीपक कुमार और विजय रावत ने इसका विरोध किया,दीपक ने आवेश में कहा, “मेरा नाम मोहम्मद दीपक है” यह वीडियो वायरल हुआ, देशभर में उनकी बहादुरी की तारीफ हुई, बजरंग दल को मुंह की खानी पड़ी,
लेकिन 31 जनवरी को बदला लेने देहरादून, ऋषिकेश से दर्जनों बजरंग दल कार्यकर्ता हूटर बजाते, जुलूस निकालते, गालियां-नारे लगाते कोटद्वार पहुंचे,थाने से चंद कदम दूर मालवीय उद्यान में सैकड़ों की संख्या में जमा होकर दीपक को ललकारा, जान से मारने की धमकियां दीं, शहर में अराजकता फैलाई जो वीडियो में साफ दिख रहा था ,चेहरे खुले, हुड़दंग खुला फिर भी पुलिस ने सख्ती नहीं दिखाई केवल समझाया,
जुलूस को विनम्रता से निकाला,
8 दिन बाद भी कोई नामजद गिरफ्तारी नहीं।
मात्र अज्ञातों पर मुकदमा दर्ज किया, जबकि दर्जनों वीडियो उपलब्ध थे,उल्टे दीपक कुमार और विजय रावत पर भी नामजद मुकदमा दर्ज कर दिया गया,
राष्ट्रीय मीडिया, बड़े नेता दीपक की बहादुरी की तारीफ कर रहे थे, लेकिन स्थानीय पुलिस ने उपद्रवियों को संरक्षण दिया और बहादुर को सजा।
निष्कर्ष पुलिस की दोहरी मापदंड गरीब अनुसूचित जाति के परिवारों पर क्रूरता, संगठित उपद्रवियों पर नरमी
ये दोनों प्रकरण कोटद्वार पुलिस की पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली को उजागर करते हैं।
गरीब, दलित पीड़ितों पर तुरंत मुकदमा, जेल, आतंक और
संगठित, प्रभावशाली उपद्रवियों पर नरमी, अज्ञात मुकदमा, कोई गिरफ्तारी नहीं।
कानून सबके लिए समान होना चाहिए,क्या कोटद्वार पुलिस केवल कमजोरों पर सख्त है और मजबूतों के सामने नतमस्तक? यह सवाल न केवल स्थानीय प्रशासन, बल्कि पूरे राज्य के लिए चिंता का विषय है।
न्याय की मांग है कि दोनों प्रकरणों की निष्पक्ष जांच हो, पीड़ितों को न्याय मिले और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो — चाहे वे कोई भी हों।
रिपोर्ट: विकास कुमार आर्य
गढ़वाल मंडल ब्यूरो प्रमुख, वंचित स्वर साप्ताहिक समाचार पत्र

