कोटद्वार गढ़वाल उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 90 के दशक में मंडल आयोग की सिफारिश लागू की गई, उस वक्त उत्तराखंड भी उत्तरप्रदेश का ही एक हिस्सा हुआ करता था, तब obc के लिए 27% आरक्षण के विरोध में गढ़वाल कुमाऊं के पर्वतीय अंचलों से उग्र आंदोलन शुरू हो गया, जब भारी विरोध के बाद भी तत्कालीन उत्तरप्रदेश सरकार ने 27% आरक्षण कड़ाई से लागू कर दिया तो वहीं आरक्षण विरोध का आंदोलन पृथक उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में बदल गया जिसके परिणाम स्वरूप 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड देश के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। उत्तराखंड में जिस ओबीसी आरक्षण के उग्र विरोध की बुनियाद पर उत्तराखंड पृथक राज्य बना था, आज उसी उत्तराखंड राज्य में अन्य पिछड़े वर्गों को मिलने वाले आरक्षण के लाभ से वही गैरआरक्षित वर्ग फलफूल रहा है जिसने 90 के दशक में ओबीसी आरक्षण का घोर एवं उग्र विरोध किया था ,उन्हें ही EWS का लाभ भी अतिरिक्त रूप से मिल रहा है। आरक्षण की इस बंदरबांट की अधिक जानकारी के लिए आप 28 जनवरी 2020 को उत्तराखंड सरकार द्वारा जारी की गई अधिसूचना संख्या – 130/x v।।- 2/20- 05(obc)2015 का अवलोकन कर सकते हैं, जिसमें प्रदेश के कई जनपदों के कई ब्लॉकों में निवास करने वाली दर्जनों सामान्य जातियों जैसे नेगी, काला, रावत, मेहता, फर्स्वाण, सुयाल, महर, कोश्यारी, रौतेला, खर्कवाल, बहुगुणा, शर्मा, कापड़ी, अवस्थी, भंडारी, बिष्ट, मखवाल, बडोला,द्विवेदी , पवार, उप्रेती, उपाध्यक्ष, सामंत, डोगरा, मेहरा, डोबरियाल, चुफाल, पाठक, पाण्डे, त्रिपाठी, शुक्ल, तिवारी,धामी आदि कई सामान्य जातियों को क्षेत्र के आधार पर पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल कर लिया गया है,वहीं उक्त अधिसूचना में साफ लिखा गया है कि अनुसूचित जाति/जनजाति को छोड़कर, सोचने वाली बात ये है कि अगर सामान्य जातियों को क्षेत्र के पिछड़ेपन की वजह से obc मान लिया गया है तो फिर उसी क्षेत्र में रहने वाले अनुसूचित जाति जनजाति को बाहर क्यों रखा गया है? उत्तराखंड में आरक्षण जैसी संवैधानिक व्यवस्था का खुलेआम दुरूपयोग किया जा रहा है और कोई बोलता नहीं, कोई सवाल नहीं करता।
इस गंभीर विषय पर अपने विचारों से अवगत कराने की कृपा कीजिएगा।
प्रेषक –
विकास कुमार आर्य
(स्वतंत्र पत्रकार)
एवं प्रदेश अध्यक्ष
शैलशिल्पी विकास संगठन मुख्यालय – कोटद्वार गढ़वाल उत्तराखंड
संपर्क – 9368474042

