पत्रकारिता का सबसे बुनियादी काम क्या है?
क्या उसका दायित्व केवल सत्ता की उपलब्धियों, सरकारी योजनाओं, उद्घाटनों और अधिकारियों के बयानों को जनता तक पहुंचाना है? या पत्रकारिता का वास्तविक काम इससे कहीं अधिक कठिन है—सत्ता से सवाल पूछना, व्यवस्था की खामियों को सामने लाना और उन लोगों की आवाज बनना, जिनकी बात अक्सर सुनी ही नहीं जाती?
यह सवाल मेरे लिए अब केवल सैद्धांतिक नहीं रहा। हाल के दिनों में यह मेरे निजी अनुभव से भी जुड़ गया है।
मुझे Tehri Media Club के एक व्हाट्सऐप समूह से हटा दिया गया। मेरी समझ में इसकी पृष्ठभूमि मेरे उन लेखों और सवालों से जुड़ी है, जिनमें मैंने पहाड़ के शिल्पकार समाज, सामाजिक असमानता और न्याय की मांग कर रहे एक पीड़ित परिवार की आवाज को प्रमुखता से उठाया।
मेरा प्रश्न सरल था—यदि किसी आलेख से असहमति है, तो उस पर संवाद क्यों नहीं? और यदि सवाल ही असुविधाजनक हो जाएं, तो पत्रकारिता का भविष्य क्या होगा?
यह किसी व्यक्तिगत शिकायत का विवरण नहीं है। किसी व्हाट्सऐप समूह की सदस्यता न मिलना पत्रकारिता का अंत नहीं है। असली चिंता कहीं बड़ी है—क्या हमारे लोकतांत्रिक समाज में असहमति के लिए जगह लगातार संकुचित हो रही है? क्या पत्रकारिता के भीतर भी स्वीकार्य होने की शर्त चुप रहना बनती जा रही है?
उत्तराखंड का पहाड़ प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। लेकिन हर सुंदर दृश्य के पीछे एक सामाजिक यथार्थ भी होता है। इस पहाड़ में ऐसे समुदाय भी हैं, जिनके श्रम ने गांवों और समाज को आकार दिया, लेकिन जिनकी आवाज मुख्यधारा के विमर्श में हमेशा बराबर जगह नहीं बना सकी।
शिल्पकार समुदाय का प्रश्न इसी व्यापक सामाजिक यथार्थ से जुड़ा है।
पहाड़ को केवल पर्यटन, लोकगीतों और देवभूमि की छवि से नहीं समझा जा सकता। उसे उस श्रम और इतिहास से भी समझना होगा, जिसने इसकी सामाजिक संरचना को सहारा दिया। उस संघर्ष से भी समझना होगा, जिसमें अनेक समुदायों ने सम्मान और बराबरी के लिए अपनी आवाज उठाई।
यदि कोई पत्रकार इन प्रश्नों को उठाता है, तो क्या वह समाज को बांट रहा है?
या वह समाज के भीतर पहले से मौजूद असमानताओं पर संवाद की मांग कर रहा है?
यह अंतर समझना जरूरी है।
सामाजिक न्याय की बात करना किसी समुदाय के विरुद्ध खड़ा होना नहीं है। पीड़ित की आवाज उठाना किसी दूसरे के खिलाफ अभियान चलाना भी नहीं है। पत्रकारिता का काम अदालत बनना नहीं है, लेकिन उसका काम सवालों को समाज और शासन तक पहुंचाना अवश्य है।
इसी संदर्भ में नई टिहरी में न्याय की मांग को लेकर धरने पर बैठे केतन लाल के परिवार का संघर्ष महत्वपूर्ण है। एक परिवार अपने बेटे के लिए न्याय मांग रहा है। उसकी अपनी पीड़ा, आशंकाएं और सवाल हैं। पत्रकारिता का दायित्व है कि वह उन सवालों को सुने, उन्हें तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत करे और न्याय की प्रक्रिया पर सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाए।
लेकिन जब किसी पत्रकार के लिए पीड़ित की आवाज उठाना ही असुविधाजनक हो जाए, तब मामला केवल एक रिपोर्ट या एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता।
वह पत्रकारिता के चरित्र से जुड़ा प्रश्न बन जाता है।
पत्रकारिता का इतिहास बताता है कि सत्ता को हमेशा प्रशंसा से अधिक असुविधा सवालों से हुई है। प्रश्न जवाब मांगते हैं। जवाबदेही चाहते हैं। वे चमकदार तस्वीर के पीछे छिपे अंधेरे को देखने की जिद करते हैं।
इसलिए हर दौर में सवाल पूछने वाले को कभी नकारात्मक, कभी विवादित और कभी असुविधाजनक कहा गया।
लेकिन असुविधाजनक होना और गलत होना एक ही बात नहीं है।
किसी पत्रकार की भाषा से असहमति हो सकती है। उसके तथ्यों की जांच हो सकती है। उसके निष्कर्षों पर बहस हो सकती है। यही स्वस्थ पत्रकारिता है।
लेकिन यदि असहमति का उत्तर संवाद की जगह बहिष्कार हो जाए, तो हमें रुककर सोचना चाहिए।
क्या हम पत्रकारिता को विचारों का मंच मानते हैं या केवल समान विचार रखने वालों का समूह?
पत्रकारिता में निष्पक्षता का अर्थ हर पीड़ा के सामने भावशून्य बने रहना नहीं है। निष्पक्षता का अर्थ है तथ्यों के प्रति ईमानदार रहना, सभी पक्षों को सुनना और आरोप तथा प्रमाण के बीच अंतर समझना।
लेकिन निष्पक्षता और उदासीनता अलग-अलग चीजें हैं।
एक पत्रकार किसी जांच एजेंसी का स्थान नहीं ले सकता, लेकिन जांच की निष्पक्षता पर सवाल जरूर उठा सकता है। वह अदालत का फैसला नहीं सुना सकता, लेकिन पीड़ित की शिकायतों और न्याय में देरी के प्रश्न को सार्वजनिक कर सकता है।
यही पत्रकारिता और प्रचार के बीच अंतर है।
आज स्थानीय पत्रकारिता गंभीर चुनौतियों के दौर से गुजर रही है। छोटे शहरों में पत्रकार जिन लोगों पर रिपोर्ट करता है, उन्हीं के बीच रहता भी है। सत्ता प्रतिष्ठान, प्रशासन, संगठनों और सामाजिक दबावों के बीच स्वतंत्र रहना आसान नहीं होता।
कई बार पत्रकार को सीधे यह नहीं बताया जाता कि क्या नहीं लिखना है। वातावरण ही उसे समझा देता है कि किस विषय पर चुप रहना अधिक सुरक्षित है।
यहीं से जन्म लेती है सबसे खतरनाक चीज—आत्म-सेंसरशिप।
जब पत्रकार लिखने से पहले यह सोचने लगे कि कहीं किसी प्रभावशाली व्यक्ति को बुरा न लग जाए, किसी संगठन से संबंध खराब न हो जाएं या किसी समूह से बाहर न कर दिया जाए, तब उसकी कलम धीरे-धीरे अपनी स्वतंत्रता खोने लगती है।
पत्रकारिता की सबसे बड़ी हार उस दिन होती है, जब पत्रकार को चुप कराने के लिए किसी आदेश की जरूरत नहीं पड़ती।
वह स्वयं चुप होना सीख जाता है।
इसलिए मेरा प्रश्न केवल यह नहीं है कि मुझे किसी व्हाट्सऐप समूह से क्यों हटाया गया।
मेरा बड़ा प्रश्न यह है—क्या हम असहमति के साथ रहने की क्षमता खोते जा रहे हैं?
लोकतंत्र में असहमति सामान्य है। पत्रकारिता में यह आवश्यक भी है। कोई लेख गलत लगे तो उसका प्रतिवाद कीजिए। कोई तथ्य गलत हो तो प्रमाण दीजिए। कोई भाषा अनुचित लगे तो उसकी आलोचना कीजिए।
लेकिन संवाद समाप्त कर देना किसी विचार का उत्तर नहीं है।
बहिष्कार तर्क का विकल्प नहीं हो सकता।
मैं एक कवि भी हूँ और पत्रकार भी। कविता ने मुझे संवेदना दी है और पत्रकारिता ने प्रश्न करना सिखाया है।
इसीलिए मेरे लिए किसी पीड़ित की आंखों का आंसू केवल भावुकता नहीं है। वह एक सार्वजनिक प्रश्न भी है। किसी शिल्पकार, मजदूर या वंचित समुदाय की पीड़ा कई बार हमारे सामाजिक ढांचे की कमजोरियों का आईना होती है।
उस आईने को तोड़ देने से चेहरा नहीं बदलता।
आज जरूरत पत्रकारिता को अधिक बहादुर बनाने की है, अधिक उत्तेजित बनाने की नहीं; अधिक तथ्यपूर्ण बनाने की है, अधिक पक्षपाती बनाने की नहीं; और अधिक संवेदनशील बनाने की है, अधिक प्रचारवादी बनाने की नहीं।
मैं अपनी लेखनी के बारे में इतना जरूर जानता हूँ कि वह उन आवाजों के पास लौटती रहेगी, जिन्हें अक्सर कम सुना जाता है।
मैं पहाड़ के शिल्पकारों की बात लिखूंगा।
मैं सामाजिक न्याय के सवाल उठाऊंगा।
मैं पीड़ित परिवारों की आवाज दर्ज करूंगा।
मैं सत्ता से सवाल पूछूंगा।
और यदि मेरे तथ्यों में कमी होगी, तो सुधार के लिए तैयार रहूंगा। यदि मेरे विचारों से असहमति होगी, तो बहस करूंगा।
लेकिन चुप नहीं रहूंगा।
क्योंकि पत्रकारिता में सबसे बड़ा खतरा आलोचना नहीं है।
सबसे बड़ा खतरा वह वातावरण है, जहां आलोचना के डर से पत्रकार प्रश्न करना बंद कर दे।
आज मुझे किसी समूह से हटाया गया है। कल शायद किसी दूसरे पत्रकार को किसी दूसरे सवाल के लिए असुविधाजनक माना जाए।
लेकिन पत्रकारिता की स्वतंत्रता की लड़ाई हर उस सवाल से शुरू होती है, जिसे कोई पूछने की हिम्मत करता है।
अंततः प्रश्न यही है—
क्या हम ऐसी पत्रकारिता चाहते हैं जो केवल सुरक्षित बातें कहे?
या ऐसी पत्रकारिता, जो असुविधाजनक होने का जोखिम उठाकर भी समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति की आवाज दर्ज करे?
मेरे लिए उत्तर स्पष्ट है।
मंच छिन सकता है।
समूह से निकाला जा सकता है।
नाम किसी सूची से हटाया जा सकता है।
लेकिन जब तक एक पत्रकार के भीतर प्रश्न जीवित हैं, तब तक उसकी पत्रकारिता जीवित है।
सच को हमेशा बहुमत की स्वीकृति की जरूरत नहीं होती।
और पत्रकारिता की असली पहचान यही है—
वह वहां भी सवाल पूछे, जहां सवाल पूछना सबसे अधिक असुविधाजनक बना दिया गया हो।
✍️ गंगा शाह ‘आशु कवि’
स्वतंत्र पत्रकार एवं कवि

