नई टिहरी वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह के नाम से सोशल मीडिया पर प्रसारित एक टिप्पणी, जिसमें SC/ST Act के तहत FIR और आर्थिक राहत को लेकर ‘8 लाख’ का उल्लेख किया गया है, को लेकर सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश कांता प्रसाद ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
कांता प्रसाद ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि “सुबह उठो, थाने जाओ, SC/ST Act में FIR कराओ और 8 लाख रुपये कमा लो”, तो ऐसी भाषा अत्याचार के पीड़ित मूलनिवासी समाज की पीड़ा को हल्का करने वाली है। इससे न्याय के लिए कानून का सहारा लेने वाले लोगों को ही संदेह की नजर से देखने का वातावरण बनता है।
उन्होंने कहा कि SC/ST Act के तहत मिलने वाली राहत किसी प्रकार की ‘कमाई’ या ‘भीख’ नहीं, बल्कि कानून और निर्धारित प्रक्रिया के तहत मिलने वाली राहत एवं पुनर्वास की व्यवस्था है। किसी शिकायत की सत्यता का निर्धारण निष्पक्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया से होना चाहिए।
‘अत्याचार नहीं दिखता, शिकायत दिखाई देती है’
कांता प्रसाद ने कहा कि मूलनिवासी समाज के दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोकना, पानी के स्रोत या बर्तन को छूने पर भेदभाव, जातिगत पहचान को लेकर हिंसा, श्मशान में भेदभाव तथा विद्यालयों में जातिगत अपमान जैसी घटनाएं समाज में मौजूद गंभीर सामाजिक पूर्वाग्रहों को सामने लाती हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब कोई पीड़ित इन परिस्थितियों के खिलाफ कानून का दरवाजा खटखटाता है, तो उसकी शिकायत पर सवाल उठाने से पहले उन सामाजिक परिस्थितियों पर सवाल क्यों नहीं उठाया जाता, जिनके कारण शिकायत की नौबत आती है।
‘न्याय व्यवस्था में पूर्वाग्रह की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता’
कांता प्रसाद ने न्याय व्यवस्था के भीतर संभावित सामाजिक पूर्वाग्रहों को लेकर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े मामलों में जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया के प्रत्येक स्तर पर निष्पक्षता बेहद महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी मामले को शुरू से ही संदेह की नजर से देखा जाए और जांच का उद्देश्य तथ्यों को निष्पक्ष रूप से सामने लाने के बजाय शिकायत को गलत साबित करना बन जाए, तो स्वाभाविक रूप से मामले की कमजोरियां ही अधिक दिखाई देंगी और पीड़ित की वास्तविक शिकायत पीछे छूट सकती है।
उन्होंने कहा—
“जिस मामले को सही ढंग से जांचने के बजाय झूठा साबित करने की मानसिकता से देखा जाएगा, उसकी कमजोरियां ही सामने आएंगी और पीड़ित की वास्तविक शिकायत पीछे छूट सकती है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी अधिकारी के बारे में उसकी जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। लेकिन इसी तरह यह मान लेना भी उचित नहीं कि संस्थागत स्तर पर सामाजिक पूर्वाग्रह की कोई संभावना ही नहीं हो सकती।
उनके अनुसार, न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता के लिए निष्पक्षता केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि पीड़ित और आरोपी—दोनों को वह निष्पक्ष दिखाई भी देनी चाहिए।
‘SC/ST Act लॉटरी टिकट नहीं’
उन्होंने कहा कि SC/ST Act ऐसा माध्यम नहीं है जिसके तहत केवल FIR दर्ज कराते ही किसी व्यक्ति को स्वतः धन प्राप्त हो जाता है। राहत और मुआवजे से संबंधित प्रावधान कानून तथा निर्धारित प्रक्रिया के अधीन हैं।
उन्होंने कहा कि यदि कोई शिकायत जांच में झूठी पाई जाती है तो कानून में उसके लिए प्रावधान मौजूद हैं। लेकिन प्रत्येक शिकायतकर्ता को पहले से ही ‘मुआवजा कमाने वाला’ मान लेना भी उतना ही अनुचित है।
कांता प्रसाद ने कहा कि न्यायिक सेवा के दौरान उन्होंने ऐसे मामलों में पीड़ितों की स्थिति को करीब से देखा है। कई मामलों में आर्थिक राहत से कहीं बड़ी समस्या सामाजिक अपमान, भय, असुरक्षा और न्याय पाने की लंबी प्रक्रिया होती है।
‘पत्रकारिता का काम पीड़ित को कटघरे में खड़ा करना नहीं’
कांता प्रसाद ने कहा कि पत्रकारिता का दायित्व तथ्यों को सामने रखना और व्यवस्था से सवाल करना है। किसी कमजोर वर्ग की शिकायत को ही संदेह के घेरे में खड़ा करना पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकता है।
उन्होंने कहा कि पत्रकारिता को जातिगत पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर संविधान और कानून के दृष्टिकोण से विषयों को देखना चाहिए।
‘मूलनिवासी समाज अब चुप नहीं रहेगा’
सेवानिवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता, सम्मान और न्याय का अधिकार देता है। मूलनिवासी समाज से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह कथित अत्याचार या भेदभाव को सहकर चुप रहे।
उन्होंने कहा कि समाज अपने अधिकारों के लिए थाने भी जाएगा, अदालत भी जाएगा और संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल भी करेगा।
कांता प्रसाद ने कहा कि किसी मामले में दोषी कौन है और निर्दोष कौन, इसका फैसला जांच और न्यायालय करेंगे। लेकिन जातिगत अत्याचार की शिकायत को महज ‘मुआवजा कमाने’ की कोशिश बताना स्वयं में गंभीर सामाजिक प्रश्न खड़ा करता है।
उन्होंने कहा कि कानून के दुरुपयोग की शिकायत हो तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, लेकिन कानून का इस्तेमाल कर न्याय मांगने वाले प्रत्येक पीड़ित को पहले से ही संदेह की नजर से देखना भी न्याय के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
‘केस को झूठा साबित करने की मानसिकता न्याय के लिए खतरा’
कांता प्रसाद ने कहा कि भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े मामलों में कभी-कभी जांच और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। यदि किसी मामले में पुलिस, अभियोजन या न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े किसी स्तर पर शिकायत को पहले से ही अविश्वसनीय मान लेने की मानसिकता पैदा हो जाए, तो निष्पक्ष जांच प्रभावित होने की आशंका रहती है।
उन्होंने कहा कि किसी मामले की कमियों को निष्पक्ष जांच में सामने आना चाहिए, न कि जांच की दिशा ही शिकायत को झूठा साबित करने के उद्देश्य से तय हो।
उनके अनुसार, यदि जांच करने वाला तंत्र किसी शिकायत को शुरू से ही गलत मानकर आगे बढ़ेगा, तो अंततः वही मामला कमजोर दिखाई देने लगेगा। इसलिए शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों के अधिकारों की रक्षा करते हुए तथ्यों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता तभी कायम रह सकती है, जब शिकायतकर्ता, आरोपी और जांच—तीनों को समान संवैधानिक दृष्टि से देखा जाए और किसी भी स्तर पर जातिगत या सामाजिक पूर्वाग्रह को निर्णय प्रक्रिया पर हावी न होने दिया जाए।
संवाददाता गंगा शाह नई टिहरी

