मेहनतकश शिल्पकार : मिट्टी, लकड़ी और लोहे में अपनी दुनिया गढ़ने वाले हाथ
विश्व आदिवासी दिवस विशेष
गंगा शाह ‘आशुकवि’
पत्रकार, नई टिहरी
विश्व आदिवासी दिवस केवल मूलनिवासी समुदायों की संस्कृति, परंपराओं और अधिकारों को स्मरण करने का अवसर भर नहीं है, बल्कि यह उन मेहनतकश समुदायों के संघर्ष, ज्ञान, श्रम और योगदान को समझने का भी दिन है, जिनकी पीढ़ियों ने अपने हाथों के हुनर से समाज की बुनियाद को मजबूत किया। उत्तराखंड का मूलनिवासी शिल्पकार समाज भी श्रम, कौशल और सृजन की इसी गौरवशाली परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
हिमालयी प्रदेश उत्तराखंड की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में एक समय ऐसा था, जब गांव लगभग आत्मनिर्भर हुआ करते थे। तब आधुनिक बाजार, मशीनें और बड़े उद्योग गांवों की पहुंच से दूर थे। खेती के औजारों से लेकर घरेलू जरूरतों के सामान तक, लकड़ी के काम से लेकर लोहे के उपकरणों तक और मिट्टी के बर्तनों से लेकर लोकजीवन की अनेक आवश्यकताओं तक—स्थानीय कारीगरों के हाथ ही गांव की जरूरतों को पूरा करते थे।
शिल्पकारों ने केवल औजार नहीं बनाए, बल्कि पहाड़ की सभ्यता को आकार दिया। खेत में चलने वाला हल, कुदाल, दरांती और अन्य कृषि उपकरण हों, घरों में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी की वस्तुएं हों या जीवन की रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़ा सामान—इन सबके पीछे मेहनतकश हाथों का ज्ञान और अनुभव छिपा था। पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता यह हुनर केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि पहाड़ की सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्था का आधार था।
लेकिन विडंबना यह रही कि जिन हाथों ने समाज को इतना कुछ दिया, उन्हीं हाथों को लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ा।
हुनर था, लेकिन अवसर नहीं।
श्रम था, लेकिन उचित मूल्य नहीं।
योगदान था, लेकिन बराबर का सम्मान नहीं।
आज बदलते समय के साथ पारंपरिक शिल्प के सामने नई और गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं। मशीनों, फैक्ट्री में बने सस्ते उत्पादों और बड़े बाजार की प्रतिस्पर्धा ने स्थानीय कारीगरों की आजीविका पर गहरा असर डाला है। गांवों में पारंपरिक औजारों और हस्तनिर्मित वस्तुओं की मांग कम हुई है। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी अपने पुश्तैनी हुनर से दूर होती जा रही है, क्योंकि उसे इस काम में सम्मानजनक आय, सामाजिक प्रतिष्ठा और सुरक्षित भविष्य दिखाई नहीं देता।
यह केवल एक समुदाय या रोजगार के खत्म होने का सवाल नहीं है। इसके साथ सदियों का अनुभव, पारंपरिक तकनीक, स्थानीय ज्ञान और एक पूरी सांस्कृतिक विरासत भी धीरे-धीरे समाप्त होने के खतरे में है।
विश्व आदिवासी दिवस का व्यापक संदेश हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि किसी मेहनतकश समुदाय की पहचान केवल उसकी वेशभूषा, परंपराओं और संस्कृति से नहीं होती। उसकी असली पहचान उसके जल, जंगल, जमीन, श्रम, शिक्षा, रोजगार, बराबरी और सम्मान के अधिकारों से भी जुड़ी होती है।
आज आवश्यकता है कि शिल्पकारों के पारंपरिक ज्ञान को केवल अतीत की निशानी मानकर संग्रहालयों और सांस्कृतिक आयोजनों तक सीमित न किया जाए। इस हुनर को आधुनिक तकनीक, डिजाइन, डिजिटल बाजार और स्वरोजगार से जोड़ना होगा। यदि कारीगरों को आधुनिक प्रशिक्षण, सस्ता ऋण, बेहतर उपकरण, कच्चे माल की सुविधा, उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार तक सीधी पहुंच मिले, तो पारंपरिक शिल्प पहाड़ की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।
पर्यटन के बढ़ते अवसरों के साथ उत्तराखंड के स्थानीय हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पादों को देश-दुनिया के बाजार तक पहुंचाया जा सकता है। इसके लिए सरकारी योजनाओं के साथ-साथ सहकारी मॉडल, स्वयं सहायता समूह, डिजिटल मार्केटिंग और स्थानीय ब्रांड विकसित करने की आवश्यकता है। इससे हुनर को सम्मान मिलेगा और युवाओं के लिए गांव में ही रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिल्पकार के हाथ को केवल मजदूर का हाथ नहीं, बल्कि कौशल, ज्ञान और सृजन का हाथ माना जाए। क्योंकि कोई भी समाज केवल बड़े भवनों, सड़कों और बाजारों से मजबूत नहीं होता; उसकी असली मजबूती उन हाथों के सम्मान में होती है, जो अपनी मेहनत से उस समाज को खड़ा करते हैं।
आज जरूरत है कि हम श्रम को केवल मजदूरी की नजर से देखना बंद करें। हुनर भी ज्ञान है, अनुभव भी शिक्षा है और सृजन भी समाज की सबसे बड़ी पूंजी है।
विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यह संकल्प लिया जाना चाहिए कि पहाड़ के मेहनतकश शिल्पकारों की परंपरा केवल इतिहास के पन्नों में दर्ज होकर न रह जाए। इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सम्मानजनक रोजगार, आत्मनिर्भरता और नई पहचान का आधार बनाया जाए।
मिट्टी को आकार देने वाले हाथ, लकड़ी में जीवन उकेरने वाले हाथ और लोहे को औजार में बदलने वाले हाथ केवल वस्तुएं नहीं गढ़ते—वे सभ्यता का इतिहास लिखते हैं।
क्योंकि आखिरकार—
शिल्पकार के हाथ सिर्फ चीजें नहीं बनाते, वे समाज का भविष्य गढ़ते हैं।

