मैं भी आशु के साथ हूँ
सच की तस्वीर दिखाई तो,
इल्ज़ामों का दौर चला,
धरने की आवाज़ लिखी तो,
सवालों का शोर चला।
न नाम लिखा, न चेहरा दिखाया,
न पहचान उजागर की,
फिर भी मेरे शब्दों पर
झूठी तोहमत क्यों मढ़ी?
मैंने देखा, वही लिखा,
जो मेरी आँखों ने देखा,
दोनों पक्षों की बात रखी,
न अपना फैसला लेखा।
मेरे कैमरे में सच सुरक्षित,
हर फुटेज गवाही देगा,
जिसने जो देखा, जो कहा—
वक्त स्वयं हिसाब लेगा।
धमकियों से कलम न रुकेगी,
शिकायतों से डर न होगा,
सच लिखना यदि अपराध है,
तो यह अपराध फिर-फिर होगा।
पहले भी दी थी शिकायत मैंने,
सुरक्षा की गुहार लगाई थी,
पर खामोशी की दीवारों ने
मेरी आवाज़ दबाई थी।
अब फिर झूठे आरोपों का
एक नया सिलसिला आया है,
लेकिन सच के सामने झूठ ने
खुद अपना चेहरा दिखाया है।
मैं पत्रकार हूँ—
किसी सत्ता का दरबारी नहीं,
किसी दबाव का हथियार नहीं,
मैं जनता की आवाज़ हूँ,
किसी के इशारे का अख़बार नहीं।
मेरी कलम बिकेगी नहीं,
मेरी खबर झुकेगी नहीं,
सच की राह कठिन सही,
पर मेरी आवाज़ रुकेगी नहीं।
अगर सवाल पूछना गुनाह है,
तो सवाल पूछता रहूँगा,
अगर सच दिखाना जुर्म है,
तो सच दिखाता रहूँगा।
मेरे साथ खड़ा हर इंसान
मेरी ताकत बन जाएगा,
एक आशु की आवाज़ दबेगी तो
हजारों का स्वर उठ जाएगा।
मैं अकेला नहीं हूँ—
मेरे साथ मेरी कलम है,
मेरे साथ सच है,
मेरे साथ संविधान है,
और सबसे बड़ी बात—
मेरे साथ जनता की आवाज़ है।
धमकी चाहे जितनी आए,
इल्ज़ाम चाहे जितने लगें,
सच की राह पर चलने वाले
कभी झुकते नहीं—
बस और मजबूत होते हैं।
मैं भी आशु हूँ,
मैं भी सच के साथ हूँ,
और जो पत्रकारिता को
डराना चाहते हैं—
उनसे सिर्फ इतना कहना है,
कलम को कैद कर सकते हो,
लेकिन विचारों को नहीं;
आवाज़ को दबा सकते हो,
लेकिन सच को नहीं।
— आशु कवि

