टिहरी सरकार मंचों और सरकारी विज्ञप्तियों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार से प्रभावित लोगों को समय पर न्याय, चिकित्सा, शिक्षा, पुनर्वास और कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की बात करती है। लेकिन जब किसी गरीब परिवार को वास्तव में न्याय की लड़ाई लड़नी पड़ती है, तब व्यवस्था की संवेदनशीलता और कानून के क्रियान्वयन की परीक्षा होती है।
टिहरी का चर्चित केतन लाल प्रकरण इसी सवाल को सामने खड़ा करता है।
केतन लाल के पिता गरीब मजदूर हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वे अपनी क्षमता से किसी वरिष्ठ अधिवक्ता की सेवाएं लेकर लंबी कानूनी लड़ाई लड़ सकें। परिवार का कहना है कि इसी आवश्यकता को देखते हुए उन्होंने 22 अगस्त 2026 को जिला मजिस्ट्रेट, टिहरी के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मृदुला जैन को पैरवी के लिए नियुक्त किए जाने का अनुरोध करते हुए आवेदन दिया।
परिवार के अनुसार इस आवेदन पर उन्हें लंबे समय तक कोई स्पष्ट आदेश नहीं मिला। बार-बार अनुरोध के बाद 16 सितंबर 2026 को लंबगांव थाने के एक दरोगा के माध्यम से उन्हें एक पत्र दिया गया, जिसमें CBCID के अधिवक्ता से संपर्क करने को कहा गया।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—यदि पीड़ित परिवार ने सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपनी पसंद के वरिष्ठ अधिवक्ता की सहायता की मांग की थी, तो उस आवेदन पर विधिवत निर्णय क्यों नहीं बताया गया? यदि अनुरोध स्वीकार नहीं किया गया था, तो उसका कारण क्या था? और यदि सरकारी व्यवस्था के माध्यम से पहले से ही कोई अधिवक्ता उपलब्ध था, तो परिवार को इसकी जानकारी समय पर और स्पष्ट रूप से क्यों नहीं दी गई?
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 में पीड़ितों और गवाहों के अधिकारों के लिए अलग से धारा 15A का प्रावधान है। वहीं धारा 15 विशेष लोक अभियोजक/विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति से संबंधित है। अधिनियम का उद्देश्य ही अत्याचार के मामलों में विशेष न्यायिक व्यवस्था तथा पीड़ितों के राहत और पुनर्वास को सुनिश्चित करना है।
इसलिए केतन लाल के पिता के आवेदन को केवल एक सामान्य प्रार्थना-पत्र मानकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं हो सकता। प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि आवेदन पर क्या कार्रवाई हुई, किस अधिकारी ने निर्णय लिया, किस कानूनी प्रावधान के तहत निर्णय लिया गया और पीड़ित परिवार को उसके अधिकारों की जानकारी किस स्तर पर दी गई।
यह सवाल किसी अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत आरोप का नहीं, बल्कि कानून के समान और प्रभावी क्रियान्वयन का है।
यदि परिवार वरिष्ठ अधिवक्ता की नियुक्ति चाहता है और उसे प्रभावी कानूनी प्रतिनिधित्व की आवश्यकता है, तो प्रशासन की जिम्मेदारी केवल यह बताकर समाप्त नहीं हो जाती कि किसी अन्य सरकारी अधिवक्ता से संपर्क कर लें।
अनुसूचित जाति जनजाति एक्ट के तहत जो सुविधाएं मिलनी चाहिए वह क्यों नहीं मिल रही है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि दबंग हत्यारों के दबाव में प्रशासन नियमनुसार कानूनी मदद नहीं दे रहा है।
परिवार को यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मुकदमे में उसकी कानूनी सहायता कैसे सुनिश्चित होगी और उसके वैधानिक अधिकारों की रक्षा कौन करेगा।
सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि 22 अगस्त से 16 सितंबर तक क्या हुआ?
आवेदन पर कोई आदेश हुआ या नहीं?
यदि हुआ तो उसकी प्रति परिवार को क्यों नहीं मिली?
यदि नहीं हुआ तो देरी का कारण क्या था?
इन सवालों का जवाब जिला प्रशासन को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
केतन लाल प्रकरण में जांच और न्यायिक प्रक्रिया अपने स्थान पर है। किसी भी आरोपी को दोषी घोषित करना अदालत का विषय है। लेकिन पीड़ित परिवार को कानून के तहत मिलने वाली सहायता और अधिकारों को लेकर प्रशासन से सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह जायज है।
सरकार यदि सचमुच यह सुनिश्चित करना चाहती है कि SC/ST अत्याचार के पीड़ितों को समय पर न्याय मिले, तो ऐसे मामलों में केवल घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। जरूरत है कि आवेदन समय पर निस्तारित हों, आदेश लिखित रूप में दिए जाएं और पीड़ित परिवार को उसके कानूनी अधिकारों की स्पष्ट जानकारी मिले।
मुख्यमंत्री की मुस्कुराती तस्वीर और टिहरी के एक गरीब मजदूर पिता की न्याय के लिए भटकती तस्वीर—इन दोनों तस्वीरों के बीच का अंतर ही आज सबसे बड़ा सवाल है।
सवाल यह नहीं कि सरकार क्या कहती है।
सवाल यह है कि केतन लाल के परिवार को जमीन पर उसके अधिकार कब मिलेंगे?
— गंगा शाह
स्वतंत्र पत्रकार, नई टिहरी

