देहरादून प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षकों से जुड़े टीईटी प्रकरण पर लंबे समय से कोई स्पष्ट, न्यायसंगत एवं विधिसम्मत समाधान न निकल पाना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। इस मामले को लेकर शिक्षकों में लगातार असंतोष और रोष बढ़ रहा है।
अनु0 जाति जनजाति शिक्षक एसोसिएशन उत्तराखंड के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश राठी ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में कार्यरत शिक्षकों के सेवा-संबंधी अधिकारों और भविष्य को प्रभावित करने वाले विषय को लंबे समय तक अनिश्चितता में रखना उचित नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 समानता एवं सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर के मूल सिद्धांतों को स्थापित करते हैं। ऐसे में टीईटी से संबंधित निर्णय लेते समय कानून, संविधान, न्यायिक आदेशों तथा शिक्षकों के सेवा अधिकारों का समुचित परीक्षण किया जाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि सरकार और शासन से अपेक्षा है कि इस विषय को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित न रखते हुए संवैधानिक एवं विधिक दृष्टिकोण से गंभीरता के साथ देखा जाए। यदि किसी न्यायिक निर्णय अथवा विधिक बाध्यता के कारण वर्तमान व्यवस्था में परिवर्तन आवश्यक है, तो उसके अनुरूप शिक्षकों के हितों की रक्षा करते हुए स्पष्ट कार्ययोजना सामने रखी जानी चाहिए।
प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि शिक्षक वर्षों से विद्यालयों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं और उनके भविष्य को अनिश्चितता में छोड़ना स्वीकार्य नहीं हो सकता। शासन को संबंधित शिक्षक संगठनों एवं विशेषज्ञों के साथ तत्काल संवाद कर समाधान का रास्ता निकालना चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि एसोसिएशन संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीके से अपने शिक्षकों के अधिकारों की आवाज उठाता रहेगा। सरकार से टकराव नहीं, बल्कि विधिसम्मत, न्यायसंगत और स्थायी समाधान की अपेक्षा है। लेकिन यदि लंबे समय तक समाधान नहीं निकला, तो शिक्षकों के बढ़ते रोष को नजरअंदाज करना शासन के लिए उचित नहीं होगा।
“टीईटी प्रकरण को लंबित रखना समाधान नहीं है। सरकार को अब स्पष्ट निर्णय और समयबद्ध कार्यवाही करनी चाहिए।”

