उत्तराखंड में एक तरफ केतन लाल जैसे 16 वर्षीय शिल्पकार युवक की मौत का सवाल समाज के सामने खड़ा है।
दूसरी तरफ हल्द्वानी में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद रामलीला मैदान के कथित ‘शुद्धीकरण’ को लेकर विवाद हुआ। इस मामले में बाद में एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर भी दर्ज हुई।
और अब 4 अक्टूबर 2026 को भाजपा ने दिनेश आर्य को उत्तराखंड से राज्यसभा प्रत्याशी घोषित किया है।
अब सवाल पूछना जरूरी है—
क्या यह महज संयोग है?
क्या दलित समाज के सामने खड़े गंभीर सवालों का जवाब एक दलित चेहरा राज्यसभा भेज देना है?
क्या किसी समाज के युवक की मौत का जवाब राजनीतिक प्रतिनिधित्व है?
क्या सामाजिक अपमान के आरोपों का जवाब एक पद देकर दिया जा सकता है?
और क्या सत्ता में किसी एक व्यक्ति को जगह मिल जाने के बाद समाज से कहा जाएगा—
“देखो, तुम्हारा आदमी तो राज्यसभा पहुंच गया, अब सवाल मत पूछो।”
नहीं!
हमें किसी दलित चेहरे के राज्यसभा पहुंचने से आपत्ति नहीं है।
हम तो चाहते हैं कि दलित, शिल्पकार, आदिवासी और वंचित समाज के लोग संसद से लेकर सत्ता के हर संस्थान तक पहुंचें।
लेकिन सवाल यह है कि प्रतिनिधित्व के साथ न्याय कहां है?
केतन के परिवार को राज्यसभा की सीट नहीं चाहिए।
उन्हें अपने बेटे की मौत का सच चाहिए।
उन्हें निष्पक्ष जांच चाहिए।
उन्हें सुरक्षा चाहिए।
उन्हें दोषियों पर कानून के मुताबिक कार्रवाई चाहिए।
और उत्तराखंड के हर शिल्पकार परिवार को यह भरोसा चाहिए कि जाति के कारण उनके बच्चों की जिंदगी असुरक्षित नहीं होगी।
इसलिए सवाल किसी व्यक्ति से नहीं, व्यवस्था से है।
अगर सत्ता सचमुच सामाजिक न्याय में विश्वास करती है तो केवल चेहरे आगे करने से काम नहीं चलेगा।
केतन को न्याय चाहिए।
पीड़ित परिवारों को सुरक्षा चाहिए।
जातिगत भेदभाव पर कठोर कार्रवाई चाहिए।
और संविधान के सामने सबकी बराबरी चाहिए।
किसी समाज को एक पद देकर उसके सारे सवाल खत्म नहीं किए जा सकते।
राज्यसभा की सीट प्रतिनिधित्व हो सकती है,
लेकिन न्याय का विकल्प नहीं।
और यही आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा सवाल है—
हमें चेहरा नहीं चाहिए, इंसाफ चाहिए।
हमें प्रतीक नहीं चाहिए, सुरक्षा चाहिए।
हमें कुर्सी नहीं चाहिए, संविधान का बराबर संरक्षण चाहिए।
केतन के लिए न्याय—उत्तराखंड के सामाजिक विवेक की असली परीक्षा है।
— गंगा शाह ‘आशुकवि’ पत्रकार

