नई दिल्ली दिनांक 27 अक्टूबर, 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने आज केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी किया है। यह नोटिस उन याचिकाओं के संबंध में है, जिनमें सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई है, जिसके तहत कुछ सरकारी और औपचारिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को गाना या बजाना अनिवार्य कर दिया गया था—इसे राष्ट्रीय गान के समान दर्जा दिया गया है। इन याचिकाओं में एक याचिका बी. डी. बोरकर द्वारा दायर की गई है, जो बामसेफ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, अंबेडकरवादी विचारक और बौद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं।
इन याचिकाओं पर जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन-न्यायाधीशों वाली पीठ ने सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है, और इन याचिकाओं को इसी विषय से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ 30 नवंबर, 2026 को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
केंद्र सरकार के आदेशों को चुनौती
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 28 जनवरी और 9 जुलाई, 2026 को जारी आदेशों के माध्यम से, कुछ खास मौकों पर ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को गाने या बजाने के संबंध में निर्देश दिए थे। बोरकर ने सुप्रीम कोर्ट में इन आदेशों को चुनौती दी है।
बोरकर की याचिका के अनुसार, राष्ट्रीय कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के केवल पहले दो पदों (स्टैंजा) का उपयोग करने की पारंपरिक प्रथा के बजाय, इसके सभी छह पदों को शामिल करना अनिवार्य बनाने का कदम महज एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है। उनके विचार में, यह निर्णय धर्मनिरपेक्षता, बंधुत्व और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक संवैधानिक सिद्धांतों पर सवाल खड़े करता है।
धर्म की स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता का मुद्दा
याचिका में कहा गया है कि ‘वंदे मातरम’ के पहले दो पद मातृभूमि की प्राकृतिक सुंदरता का वर्णन करते हैं। वहीं, यह तर्क दिया गया है कि चूंकि बाद के चार पदों में हिंदू देवी-देवताओं का उल्लेख है, इसलिए सभी नागरिकों के लिए इन पदों को गाना अनिवार्य करना एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है।
मा. बोरकर ने तर्क दिया है कि किसी व्यक्ति को ऐसी सामग्री गाने के लिए मजबूर करना, जो उसकी धार्मिक मान्यताओं, अंतरात्मा या दार्शनिक दृष्टिकोण के विपरीत हो, इस मामले को संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
केंद्र सरकार के निर्देशों को चुनौती देते हुए, उन्होंने राष्ट्रगान के स्वरूप को बदलने के अधिकार पर भी सवाल उठाया है।
दो अलग-अलग याचिकाओं पर संज्ञान
बोरकर द्वारा दायर याचिका के साथ-साथ, सुप्रीम कोर्ट ने केरल के पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी बालकृष्णन सत्यभामा मावोजि द्वारा दायर एक याचिका पर भी नोटिस जारी किया है।
मावोजि ने ‘वंदे मातरम’ के सभी छह पदों को गाना या बजाना अनिवार्य करने के फैसले को भी चुनौती दी है। उन्होंने कोर्ट का ध्यान धर्म की स्वतंत्रता, अंतरात्मा की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक बंधुत्व से जुड़े मुद्दों की ओर आकर्षित किया है।
दोनों याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार द्वारा जारी संबंधित आदेशों को रद्द करने की मांग की है।
अदालत की ओर से अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं आया है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर इन याचिकाओं पर अपना पक्ष रखने को कहा है। हालांकि, इस चरण में अदालत ने न तो याचिकाकर्ताओं के दावों को स्वीकार किया है और न ही केंद्र सरकार के आदेशों को असंवैधानिक घोषित करते हुए कोई अंतिम फैसला सुनाया है। इसलिए, इस मामले में अगली सुनवाई काफी महत्वपूर्ण होगी।

