लेखक: अरविंद लाल (शाह) – सहायक अध्यापक कहते हैं कि पहाड़ों की चढ़ाई जितनी कठिन होती है, शिखर से नजारा उतना ही खूबसूरत होता है। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल की खूबसूरत वादियों के बीच बसे पूर्वाल गाँव (पट्टी हिंदाव, तहसील घनसाली) से निकले एक युवा के जीवन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। दर्शन लाल शाह और ऐला देवी शाह के आंगन में जन्मे अरविंद लाल (शाह) आज केवल एक नाम नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों और मनुवादी सोच के खिलाफ कभी न हार मानने वाले हौसले की जीती-जागती मिसाल हैं।
पिता का पसीना और दादा-दादी का आशीर्वाद
मेरे पिता एक राजमिस्त्री थे। सुबह से शाम तक पत्थरों पर चलने वाली उनकी हथौड़ी से जो पैसे निकलते थे, उसी से हमारे घर की नींव टिकी थी। इस संघर्ष में मेरे दादाजी बचलू शाह को मुझसे बहुत आस थी, वे हमेशा मेरा हौसला बढ़ाते रहते थे। वहीं मेरी दादीजी सुशीला देवी मेरी सबसे सच्ची दोस्त थीं। वे हर संभव मेरी मदद करती थीं और कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटकर जब मैं घर लौटता, तो वे बेसब्री से मेरा इंतजार करती थीं। उनका यही निस्वार्थ प्रेम मेरी सबसे बड़ी ताकत थी।
ईमानदारी का फल और षड्यंत्र की शुरुआत
साल 2006 में मेरा चयन सहायक अध्यापक के पद पर हुआ था। मैंने पूरी निष्ठा के साथ विद्यालय को एक बेहतरीन पोजीशन पर पहुँचाया। साल 2015 में ही मैंने केंद्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा (CTET) भी उत्तीर्ण कर ली थी। साल 2016 में जब सरकार ने कर्मचारियों को वित्तीय लाभ (वित्त) देना चाहा, तब विभाग के कुछ मनवादी सोच और घटिया मानसिकता के लोगों ने मेरी फाइल को जानबूझकर शासन को नहीं भेजा। योग्यता न होने के बावजूद अन्य लोगों को लाभ दिया गया, लेकिन मुझे मेरे अधिकार से वंचित रखने के लिए विभागों के चक्कर कटवाए गए।
भूखा पेट, खाली जेब और अपनों का वियोग
जब समाज के कुछ लोगों ने मुझे ‘बेकार और निकम्मा’ समझ लिया, तब मेरा गरीब परिवार मेरी ढाल बना। मेरे छोटे भाई-बहनों ने अपना पेट काटकर, एक-एक रुपया जोड़कर मुझे नैनीताल हाई कोर्ट भेजने का खर्च दिया। मैं भूखे पेट और खाली जेब, बिना धूप और बरसात की परवाह किए बस न्याय की राह पर चलता रहा। लेकिन इस लंबी लड़ाई का सबसे बड़ा दर्द मुझे तब मिला, जब व्यवस्था के इस मनुवादी तंत्र से लड़ते-लड़ते मेरे दादा-दादी निराश हो गए और साल 2023 में मेरी अंतिम कामयाबी देखे बिना ही दोनों इस दुनिया से विदा हो गए। उनकी मृत्यु मेरे जीवन का सबसे कठिन और भावुक पल था। मेरे वृद्ध माता-पिता भी इस अन्याय को देख खून के आंसू रोते रहे।
नैनीताल हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
मैं उच्च न्यायालय नैनीताल में अपने हक के लिए लड़ता रहा। साल 2025 में सिंगल बेंच ने मेरे पक्ष में अन्य कर्मचारियों की भांति वेतन देने का आदेश जारी किया। इसके बावजूद, विभाग का तंत्र बाज नहीं आया और वह इस फैसले के खिलाफ स्पेशल अपील (डबल बेंच) में चला गया। आखिरकार, पूरे 20 साल के इस लंबे संघर्ष के बाद, उच्च न्यायालय की डबल बेंच ने विभाग की अपील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मुझे साल 2016 से ही अन्य कर्मचारियों की भांति पूरा वेतन और वित्तीय लाभ देने का आदेश पारित किया।
सच्चाई की जीत और नया सवेरा
20 सालों के इस वनवास के खत्म होने के बाद, आज मेरे माता-पिता के आंसुओं की जगह उनकी आँखों में खुशी की चमक है। मेरे भाई-बहनों के दिलों में जो आस जगी थी, वह आज सच साबित हुई है। जो लोग मुझे हराना चाहते थे, उन्हें कोर्ट के इस फैसले ने करारा जवाब दिया है। आज भले ही मेरे दादा-दादी इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन स्वर्ग से उनका आशीर्वाद मुझ पर जरूर बरस रहा होगा।
युवाओं और समाज के लिए संदेश
मेरा जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि आप सच्चे हैं, तो परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत हों, आपको हार नहीं माननी चाहिए। व्यवस्था में बैठे कुछ भ्रष्ट लोग आपका रास्ता रोक सकते हैं, लेकिन वे न्याय को कभी पराजित नहीं कर सकते। अपने परिवार की एकजुटता पर भरोसा रखिए, क्योंकि मजबूत से मजबूत महल भी परिवार के साथ और अटूट हौसले के बिना अधूरा है।

