फूलन देवी की जयंती पर केवल फूल चढ़ाने, नारे लगाने और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने से इतिहास का कर्ज अदा नहीं होगा। असली सवाल यह है कि क्या हम उस अन्याय, अपमान और सामाजिक वंचना के खिलाफ खड़े होने का साहस रखते हैं, जिसके खिलाफ फूलन देवी का पूरा जीवन एक चुनौती बनकर खड़ा रहा?
उत्तराखण्ड के वंचित शिल्पकार समाज को आज इस सवाल का जवाब देना होगा—आखिर कब तक चुप रहोगे?
जिन हाथों ने सदियों से पहाड़ के गांव बसाए, लोहे को आकार दिया, लकड़ी को तराशा, खेती-बाड़ी में अपना पसीना बहाया और समाज की जरूरतों को अपने हुनर से पूरा किया, उन्हीं मेहनतकश हाथों को आज भी बराबरी और सम्मान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह केवल विडंबना नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल है, जो श्रम तो लेती है, लेकिन श्रमिक को पूरा सम्मान देने से कतराती है।
फूलन देवी का जीवन हमें यह चेतावनी देता है कि जब व्यवस्था कमजोर की आवाज सुनना बंद कर देती है, तब दबा हुआ आक्रोश इतिहास के सामने सवाल बनकर खड़ा हो जाता है। इसलिए किसी भी वंचित समाज को हिंसा नहीं, बल्कि संविधान, शिक्षा, संगठन, लोकतांत्रिक संघर्ष और निर्भीक आवाज के रास्ते पर अपनी ताकत बनानी होगी।
आज उत्तराखण्ड का शिल्पकार समाज अनेक सवालों से घिरा है। सामाजिक अपमान की घटनाओं पर अक्सर सन्नाटा क्यों छा जाता है? किसी पीड़ित शिल्पकार परिवार के साथ अन्याय होने पर समाज की सामूहिक आवाज कमजोर क्यों पड़ जाती है? प्रतिनिधित्व के नाम पर केवल कुछ चेहरे आगे कर देने से पूरे समाज का विकास कैसे होगा?
सबसे बड़ा संकट बाहरी अत्याचार से पहले भीतर की चुप्पी है।
वंचित समाज को यह समझना होगा कि अधिकार कोई दान नहीं होते। सम्मान किसी की कृपा से नहीं मिलता। अधिकारों की रक्षा जागरूकता, शिक्षा और संगठित संघर्ष से होती है। जो समाज अपने इतिहास को भूल जाता है, अपने संघर्षों को याद नहीं रखता और अपने उत्पीड़ित भाई-बहनों के लिए खड़ा नहीं होता, उसकी आवाज सत्ता के गलियारों में धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है।
फूलन देवी की जयंती पर उत्तराखण्ड के वंचित शिल्पकार समाज को एक नया संकल्प लेना चाहिए—अब किसी पीड़ित की लड़ाई अकेली नहीं होगी। किसी शिल्पकार के अपमान पर पूरा समाज बोलेगा। शिक्षा को हथियार बनाया जाएगा, संविधान को ढाल और संगठन को अपनी ताकत।
आज जरूरत किसी व्यक्ति विशेष की पूजा करने की नहीं, बल्कि उसके संघर्ष से सवाल उठाने की है। जरूरत है कि गांव-गांव में वंचित समाज अपने बच्चों को पढ़ाए, युवाओं को संगठित करे, महिलाओं को नेतृत्व दे और अन्याय के खिलाफ संवैधानिक तरीके से निर्भीक आवाज उठाए।
फूलन देवी की जयंती पर यह याद रखना होगा—
“हमारा संघर्ष किसी के खिलाफ नहीं,
बल्कि अन्याय के खिलाफ है।
हमारी लड़ाई किसी से नफरत की नहीं,
बल्कि बराबरी और सम्मान की है।
अब चुप्पी नहीं, चेतना चाहिए।
अब डर नहीं, संगठन चाहिए।
अब दया नहीं, अधिकार चाहिए।”
उत्तराखण्ड के मेहनतकश वंचित शिल्पकारों के लिए फूलन देवी की जयंती का यही संदेश है—
उठो, पढ़ो, संगठित होओ और अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए लोकतांत्रिक संघर्ष करो; क्योंकि जो समाज अपनी आवाज स्वयं नहीं बनता, उसकी पीड़ा अक्सर दूसरों की राजनीति का केवल एक मुद्दा बनकर रह जाती है।
— गंगा शाह ‘आशुकवि’
पत्रकार, नई टिहरी

