अदवाणी (टिहरी गढ़वाल) चिपको आंदोलन की ऐतिहासिक धरती अदवाणी के जंगलों में फायर लाइन निर्माण के नाम पर चीड़ के पेड़ों की कटाई किए जाने का मामला सामने आया है। पूर्व प्रधानाचार्य एवं बचनी देवी के पुत्र किशन सिंह रावत ने इस संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि जंगल में फायर लाइन काटने के नाम पर बड़ी संख्या में चीड़ के पेड़ों को चिह्नित कर उन पर घन चलाया जा रहा है।
किशन सिंह रावत के अनुसार उन्होंने मौके पर कार्य कर रहे श्रमिकों से बातचीत की तो उन्हें जानकारी मिली कि करीब 150 पेड़ों पर घन लगाया गया है। मामले में नरेंद्रनगर के डीएफओ से दूरभाष पर जानकारी लेने पर उन्होंने बताया कि फायर लाइन तैयार करने का कार्य सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन में किया जा रहा है। फायर लाइन के लिए 10 फीट और 30 फीट की चौड़ाई के अनुसार कार्य किए जाने की बात सामने आई है।
हालांकि, इस कार्रवाई को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। सवाल यह है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने फायर लाइन बनाने के निर्देश दिए हैं या फायर लाइन बनाने के लिए चीड़ के पेड़ों को काटने के निर्देश दिए गए हैं?
स्थानीय लोगों का कहना है कि अदवाणी के जंगलों में पहले से भी फायर लाइनें मौजूद हैं। ऐसे में यह जांच का विषय है कि पुरानी फायर लाइनों के निर्माण के दौरान क्या पेड़ों की कटाई की गई थी और यदि नहीं, तो वर्तमान में फायर लाइन निर्माण के लिए पेड़ों की कटाई क्यों आवश्यक मानी जा रही है।
पेड़ों की कटाई के बजाय विकल्पों पर हो विचार
वनाग्नि की रोकथाम के लिए फायर लाइन जरूरी हो सकती है, लेकिन इसके लिए पेड़ों की कटाई को अंतिम विकल्प माना जाना चाहिए। सूखी झाड़ियों और ज्वलनशील वन सामग्री को हटाने, मौजूदा फायर लाइनों के रखरखाव तथा अन्य वैज्ञानिक उपायों के माध्यम से भी आग की रोकथाम के विकल्प तलाशे जा सकते हैं।
अदवाणी केवल एक जंगल नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पर्यावरणीय संघर्ष और चिपको आंदोलन की ऐतिहासिक स्मृति से जुड़ी धरती है। ऐसे क्षेत्र में पेड़ों की कटाई से जुड़ा प्रत्येक निर्णय पारदर्शी, वैज्ञानिक और जनहित में होना चाहिए।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार और वन विभाग को पेड़ों की बलि देने के बजाय आग की रोकथाम के पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों पर विचार करना चाहिए। साथ ही यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कितने पेड़ चिह्नित किए गए हैं, कटान की अनुमति किस आधार पर दी गई है और फायर लाइन के लिए वास्तव में कितने पेड़ों को हटाना आवश्यक है।
चिपको की धरती पर उठे ये सवाल केवल करीब 150 पेड़ों तक सीमित नहीं हैं। सवाल यह है कि जंगल की आग रोकने के नाम पर जंगल ही कितना काटा जाएगा?

