नई टिहरी चुनावी राजनीति में किसी भी समाज के नायक-नायिकाएँ केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं होते, बल्कि वे उस समाज की सामूहिक स्मृति, पहचान, अस्मिता और आत्मसम्मान के प्रतीक होते हैं। उत्तराखंड के शिल्पकार समुदाय के लिए मुंशी हरिप्रसाद टम्टा, जयानंद भारती, बलदेव सिंह आर्य और लक्ष्मी टम्टा जैसे व्यक्तित्व केवल इतिहास के पात्र नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा, समानता और सम्मान की लंबी लड़ाई के प्रेरणास्रोत हैं।
उत्तराखंड में शिल्पकार आंदोलन का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। वर्ष 1905 में मुंशी हरिप्रसाद टम्टा ने अल्मोड़ा में ‘टम्टा सुधार सभा’ की स्थापना कर बेगार प्रथा, छुआछूत और जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संगठित संघर्ष का बिगुल फूंका। आगे चलकर जयानंद भारती, खुशीराम और बलदेव सिंह आर्य ने इस आंदोलन को गढ़वाल तक विस्तार दिया। आर्य समाज के प्रभाव से यह आंदोलन शिक्षा, सामाजिक सुधार और समान अवसरों का आंदोलन बन गया।
यह आंदोलन केवल पुरुष नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा। उत्तराखंड की प्रथम दलित महिला स्नातक एवं पत्रकार लक्ष्मी टम्टा ने ऐसे समय में उच्च शिक्षा प्राप्त कर पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान बनाई, जब शिल्पकार समाज की बेटियों के लिए विद्यालय तक पहुँचना भी कठिन था। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि शिल्पकार आंदोलन केवल आरक्षण की लड़ाई नहीं था, बल्कि शिक्षा, ज्ञान, आत्मसम्मान और प्रतिनिधित्व का भी आंदोलन था।
उत्तराखंड राज्य आंदोलन और आरक्षण का प्रश्न
उत्तराखंड राज्य आंदोलन के इतिहास का एक पक्ष आरक्षण को लेकर हुए विवादों से भी जुड़ा रहा है। उस समय अनेक कर्मचारी संगठनों और सामाजिक समूहों ने पदोन्नति में आरक्षण सहित कुछ आरक्षण नीतियों का विरोध किया। तत्कालीन समाचार पत्रों में भी ऐसे दावे प्रकाशित हुए कि उत्तराखंड राज्य आंदोलन की पृष्ठभूमि में आरक्षण विरोध एक महत्वपूर्ण मुद्दा रहा। यह दृष्टिकोण इतिहास और राजनीति के अध्ययन का विषय है, जिस पर अलग-अलग मत मौजूद हैं।
इसी संदर्भ में शिल्पकार समाज के एक बड़े वर्ग का मानना रहा कि नए राज्य के निर्माण के बाद सामाजिक न्याय, समान अवसर और राजनीतिक भागीदारी की उनकी अपेक्षाएँ पूरी तरह साकार नहीं हो सकीं। उनके अनुसार, चुनावी राजनीति में समुदाय के मूल मुद्दों की अपेक्षा प्रतीकात्मक सम्मान को अधिक महत्व मिला।
चुनावी राजनीति और प्रतीकवाद
आज लगभग सभी राजनीतिक दल मुंशी हरिप्रसाद टम्टा, बलदेव सिंह आर्य और अन्य महापुरुषों की जयंती पर माल्यार्पण करते हैं, स्मारकों की घोषणा करते हैं और श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। किंतु प्रश्न यह है कि क्या उनके विचारों को भी उतनी ही गंभीरता से लागू किया गया?
यदि शिक्षा में समान अवसर, भूमि और संसाधनों में न्यायपूर्ण भागीदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, रोजगार, पत्रकारिता, प्रशासन और उच्च शिक्षा में शिल्पकार समाज की हिस्सेदारी पर ठोस पहल नहीं होती, तो केवल प्रतीकों के सहारे किसी आंदोलन की वैचारिक ऊर्जा लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती।
ढलता हुआ आंदोलन या नए संघर्ष की शुरुआत?
आज उत्तराखंड में शिल्पकार आंदोलन एक वैचारिक मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है। समाज के सामने प्रश्न केवल आरक्षण का नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, पलायन, जल-जंगल-जमीन पर अधिकार, स्थानीय संसाधनों में भागीदारी और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का भी है।
यदि आंदोलन इन समकालीन प्रश्नों को अपने केंद्र में रखता है, तो वह पुनः नई ऊर्जा प्राप्त कर सकता है। लेकिन यदि वह केवल जयंतियों, स्मारकों और चुनावी नारों तक सीमित रह जाता है, तो उसकी वैचारिक शक्ति धीरे-धीरे क्षीण होती जाएगी।
निष्कर्ष
मुंशी हरिप्रसाद टम्टा का सामाजिक सुधार, जयानंद भारती का संगठन निर्माण, बलदेव सिंह आर्य का जनजागरण और लक्ष्मी टम्टा का शैक्षिक एवं पत्रकारिता संघर्ष आज भी उत्तराखंड के लिए प्रासंगिक हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इन महापुरुषों और महानायिकाओं को केवल श्रद्धांजलि तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उनके विचारों को सामाजिक और राजनीतिक नीतियों में स्थान मिले।
जब तक शिल्पकार समाज शिक्षा, नेतृत्व, नीति-निर्माण और संसाधनों में समान भागीदारी हासिल नहीं करता, तब तक सामाजिक न्याय का लक्ष्य अधूरा रहेगा। इतिहास केवल अतीत को याद करने के लिए नहीं होता, बल्कि वर्तमान को दिशा देने और भविष्य का मार्ग प्रशस्त करने के लिए भी होता है। यही शिल्पकार आंदोलन की सबसे बड़ी सीख है।
संवाददाता
गंगा शाह नई टिहरी

