नई टिहरी उत्तराखंड में शिल्पकारों की सुरक्षा, सम्मान और सामाजिक न्याय को लेकर सरकारों के दावों के बीच जगदीश चंद्र हत्याकांड आज भी कई गंभीर सवाल खड़े करता है। 1 सितंबर 2022 को हुई इस जघन्य हत्या को वर्षों बीत चुके हैं, लेकिन पीड़ित परिवार और समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है—न्याय कब मिलेगा?
आज जैसे नाबालिक छात्र केतन लाल हत्याकांड मामले में मिडिया कर्मियों की गोलबंदी दिखाई दी ठीक उस वक्त भी वही परिस्थिति थी
हर सप्ताह अखबारों के पन्ने ऐसी खबरों से भरे रहते हैं, जिनमें किसी को उसकी राय, धर्म, जाति या पहचान के कारण कैद, प्रताड़ित अथवा मौत के घाट उतार दिया जाता है। इन खबरों को पढ़कर आम पाठक के भीतर आक्रोश तो पैदा होता है, लेकिन उसके साथ एक गहरी बेबसी भी जुड़ी रहती है। आखिर वह करे तो क्या करे?
लेकिन केवल आक्रोश व्यक्त करने से अन्याय समाप्त नहीं होगा। जरूरत इस बात की है कि अन्याय के खिलाफ उठने वाली आवाजें सामूहिक, शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक कार्रवाई में बदलें। जब नागरिक अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर सवाल पूछते हैं, तभी सत्ता को जवाबदेह बनाया जा सकता है।
जगदीश हत्याकांड भी यही सवाल पूछ रहा है।
क्या शिल्पकार केवल चुनाव के समय याद आता है?
चुनाव आते ही राजनीतिक दल दलित सम्मान, सामाजिक न्याय और संविधान की रक्षा की बातें करते हैं। शिल्पकार समाज को उसके अधिकारों और सुरक्षा का भरोसा दिलाया जाता है। लेकिन चुनाव बीत जाने के बाद उन्हीं मुद्दों की प्राथमिकता कितनी रह जाती है, यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
जगदीश चंद्र की हत्या ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है।
मुख्यमंत्री जी, प्रदेश की जनता जानना चाहती है कि इस मामले में न्याय की प्रक्रिया कहां तक पहुंची? पीड़ित परिवार को न्याय के लिए और कितना इंतजार करना होगा?
दोषियों को फांसी मिले या कोई अन्य सजा—इसका अंतिम फैसला न्यायालय करेगा। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी है कि जांच और अभियोजन प्रभावी ढंग से हो तथा न्याय की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी न हो।
यह किसी जाति या समुदाय के खिलाफ नफरत का सवाल नहीं है। यह कानून के राज, संविधान और नागरिकों के समान अधिकारों का सवाल है।
अगर किसी कमजोर व्यक्ति की हत्या के बाद उसका परिवार वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करता रहे, तो समाज का यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कानून का संरक्षण सबसे कमजोर व्यक्ति तक कितनी मजबूती से पहुंच रहा है?
जगदीश हत्याकांड को लेकर उठ रही आवाज को राजनीतिक नारे के बजाय न्याय और जवाबदेही की मांग के रूप में देखा जाना चाहिए।
सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि मामले की वर्तमान स्थिति क्या है, न्यायिक प्रक्रिया किस चरण में है और पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
अब सवाल सिर्फ जगदीश का नहीं है। सवाल हर उस नागरिक का है, जो चाहता है कि उसकी जाति, धर्म, विचार या सामाजिक स्थिति चाहे जो हो—कानून की नजर में उसकी जिंदगी की कीमत बराबर हो।
मुख्यमंत्री जी, जवाब दीजिए—
जगदीश को न्याय कब मिलेगा?
पीड़ित परिवार का इंतजार कब खत्म होगा?
और क्या मूलनिवासी शिल्पकार समाज केवल चुनाव का मुद्दा बनकर रह जाएगा?
जनता जवाब चाहती है।
— गंगा शाह ‘आशु कवि’
पत्रकार, नई टिहरी

