आज इंजीनियर्स डे है। देश आधुनिक इंजीनियरिंग, बड़ी-बड़ी डिग्रियों, प्रतिष्ठित संस्थानों और अत्याधुनिक तकनीक की उपलब्धियों को याद कर रहा है। लेकिन इसी अवसर पर पहाड़ की उन अनगिनत प्रतिभाओं को भी याद किया जाना चाहिए, जिनके पास इंजीनियरिंग की कोई औपचारिक डिग्री नहीं थी, मगर उनके हाथों में ऐसा हुनर था, जिसे देखकर आज भी आधुनिक इंजीनियरिंग के विद्यार्थी चकित हो सकते हैं।
ऐसा ही एक नाम है झीम राम
झीम राम मेरे गांव के उन विलक्षण शिल्पियों में से एक थे, जिन्होंने बिना किसी इंजीनियरिंग की औपचारिक शिक्षा के पत्थरों को तराशकर ऐसी दो पुलियाएं तैयार कीं, जो करीब छह दशक बाद भी पहाड़ की गाड़-गधेरों पर मजबूती से खड़ी हैं। न लोहे का सहारा, न सीमेंट की आधुनिक तकनीक—सिर्फ पत्थर, सही नाप, संतुलन और पीढ़ियों से अर्जित अनुभव।
यह सिर्फ दो पुलियाएं नहीं हैं। यह पहाड़ की उस लोक-इंजीनियरिंग का जीवंत दस्तावेज हैं, जिसे इतिहास की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिल पाया, जिसकी वह हकदार थी।
कल्पना कीजिए—दशकों तक पहाड़ की बारिश, बर्फ, भूस्खलन और उफनती गाड़-गधेरों का सामना करने के बाद भी पत्थरों का वह जोड़ कायम है। आज भी पहाड़ के अनेक हिस्सों में पुराने डाट पुल दिखाई देते हैं। इन पुलों में पत्थरों को इतनी सटीक नाप और कोण के साथ काटा जाता था कि वे बिना सीमेंट के भी एक-दूसरे को थामे रहते थे। यह किसी एक व्यक्ति का कौशल नहीं, बल्कि पीढ़ियों से विकसित हुई स्थानीय तकनीकी समझ का परिणाम था।
डिग्री नहीं थी, लेकिन पहाड़ की नब्ज पहचानते थे
आज इंजीनियरिंग का अर्थ अक्सर डिग्री, डिजाइन, मशीन और आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाता है। लेकिन पहाड़ के शिल्पकारों की इंजीनियरिंग प्रकृति, भूगोल और स्थानीय परिस्थितियों को समझने से पैदा हुई थी।
वे जानते थे कि किस पत्थर का इस्तेमाल कहां करना है, किस दिशा में उसका भार पड़ेगा, नींव कितनी गहरी होनी चाहिए, पानी का बहाव किस तरफ जाएगा और किस तरह पत्थरों को आपस में इस प्रकार जमाया जाए कि पूरा ढांचा एक-दूसरे का भार संभाल सके।
उन्होंने पहाड़ में सिर्फ पुल नहीं बनाए। पत्थर के मकान, डाट, रास्ते, नौले, धारें, खेतों की मेड़ें और अन्य निर्माण खड़े किए, जिनमें से अनेक आज भी अपने शिल्प की गवाही दे रहे हैं।
विडंबना यह है कि इन निर्माणों पर अक्सर न किसी इंजीनियर का नाम लिखा गया, न किसी ठेकेदार का बोर्ड लगा और न ही इन शिल्पकारों की कहानियां सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हुईं।
काम खड़ा रहा, लेकिन कारीगर इतिहास से गायब हो गया।
पहाड़ की असली इंजीनियरिंग को किसने दर्ज किया?
झीम राम जैसे शिल्पकारों का संघर्ष केवल निर्माण करने तक सीमित नहीं था। सीमित संसाधनों, कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और अत्यंत श्रमसाध्य जीवन के बीच उन्होंने अपने हुनर से पहाड़ को रहने योग्य बनाया।
उन्होंने जो बनाया, वह केवल पत्थर का ढांचा नहीं था; वह उनके अनुभव, श्रम, धैर्य और वैज्ञानिक समझ का परिणाम था।
लेकिन समूचे पहाड़ में ऐसे शिल्पकारों के अथक संघर्ष को व्यवस्थित रूप से दर्ज नहीं किया गया। उनकी तकनीक किताबों में नहीं आई। उनके नाम शिलापट्टों पर नहीं लिखे गए। उनके अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोई मजबूत व्यवस्था नहीं बनी।
आज आधुनिक निर्माण तकनीक के दौर में यह ज्ञान धीरे-धीरे हमारे बीच से गायब हो रहा है।
झीम राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, एक परंपरा का नाम हैं
झीम राम को याद करना केवल अपने गांव के एक बुजुर्ग शिल्पकार को श्रद्धांजलि देना नहीं है। यह उस पूरी परंपरा को सम्मान देना है, जिसने पहाड़ के कठिन भूगोल में मानव जीवन को संभव बनाया।
हर गांव में शायद कोई न कोई ऐसा झीम राम रहा होगा।
किसी ने पत्थर की दीवार खड़ी की होगी।
किसी ने बिना सीमेंट के डाट बनाया होगा।
किसी ने नौला और धारा बनाया होगा।
किसी ने लकड़ी का पुल तैयार किया होगा।
किसी ने ऐसा मकान बनाया होगा, जो सौ साल बाद भी खड़ा होगा।
लेकिन सवाल यह है—हमने उनके नाम और उनके हुनर को कितना बचाया?
इंजीनियर्स डे पर एक जरूरी संकल्प
इंजीनियर्स डे केवल आधुनिक इंजीनियरों और महान अभियंताओं को याद करने का दिन नहीं होना चाहिए। यह उन गुमनाम लोक-शिल्पियों को याद करने का अवसर भी होना चाहिए, जिन्होंने बिना प्रमाणपत्र और बिना आधुनिक उपकरणों के पहाड़ की जरूरतों के अनुरूप अद्भुत निर्माण किए।
एम. विश्वेश्वरैया जैसे महान अभियंताओं को नमन करते हुए हमें अपने गांव-कस्बों के उन शिल्पकार-पूर्वजों को भी सम्मान देना चाहिए, जिनके श्रम पर पहाड़ की कई पीढ़ियों का जीवन टिका रहा।
डिग्री ज्ञान का प्रमाण हो सकती है, लेकिन अनुभव भी ज्ञान का एक विशाल विद्यालय है।
झीम राम के पास इंजीनियरिंग की डिग्री नहीं थी, लेकिन उनके पास पहाड़ की नब्ज पहचानने वाली आंखें, पत्थर को समझने वाले हाथ और वर्षों के अनुभव से अर्जित वह ज्ञान था, जिसे किसी विश्वविद्यालय की चारदीवारी में आसानी से नहीं सिखाया जा सकता।
आज जरूरत है कि हम अपने-अपने गांवों और क्षेत्रों के ऐसे शिल्पकार-पूर्वजों की कहानियां खोजें, उन्हें लिखें, उनके निर्माणों का दस्तावेजीकरण करें और उनकी पारंपरिक तकनीकों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएं।
क्योंकि असली इंजीनियरिंग सिर्फ किताबों में नहीं होती—कई बार वह पहाड़ की मिट्टी, पत्थरों और पसीने में लिखी होती है।
झीम राम को शत-शत नमन।
और उन सभी गुमनाम पहाड़ी शिल्पकारों को सलाम, जिन्होंने अपने हाथों से पहाड़ का इतिहास गढ़ा।
आलेख : गंगा शाह, पत्रकार, नई टिहरी

